खोपोली में बनने वाली ओल्ड मॉन्क को लेकर खाद्य सुरक्षा नियामक ने लेबल और उत्पाद की श्रेणी पर आपत्ति जताई थी। कंपनी अब नए लेबल पेश करेगी और नियामक के सामने अपना पक्ष रखेगी।
राहुल गुप्ता
मुंबई, 6 नवंबर। लोकप्रिय शराब ब्रांड ओल्ड मॉन्क की महाराष्ट्र में बिक्री पर लगी रोक के मामले में नया घटनाक्रम सामने आया है। कंपनी मोहान रॉकी स्प्रिंगवाटर प्राइवेट लिमिटेड ने बॉम्बे हाईकोर्ट में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के आदेश को चुनौती देने वाली अपनी याचिका वापस ले ली है। कंपनी ने अदालत को बताया कि वह नए लेबल तैयार कर नियामक के सामने पेश करेगी।
ओल्ड मॉन्क का निर्माण रायगढ़ जिले के खोपोली स्थित संयंत्र में किया जाता है। एफएसएसएआई की कार्रवाई के बाद मई-जून 2026 से महाराष्ट्र में इसकी बिक्री रुकी हुई है।
लेबल पर क्या थी नियामक की आपत्ति
एफएसएसएआई ने निरीक्षण के बाद उत्पाद के लेबल पर आपत्ति जताई थी। नियामक का कहना था कि इसमें बाहरी रम फ्लेवर मिलाया गया है, लेकिन लेबल पर यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उत्पाद फ्लेवर्ड लिकर है या रम फ्लेवर्ड स्पिरिट।
नियामक के मुताबिक, उत्पाद को केवल रम के रूप में पेश करने से उसकी वास्तविक संरचना के बारे में उपभोक्ताओं को भ्रम हो सकता है। कंपनी ने पहले लेबल में बदलाव करने की कोशिश की थी, लेकिन एफएसएसएआई ने उस पर भी आपत्ति जताई।
कंपनी ने हाईकोर्ट में क्या कहा
कंपनी ने अगस्त 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। सुनवाई के दौरान कंपनी ने बताया कि वह नियामक के आदेश के खिलाफ वैधानिक प्राधिकरण के समक्ष अपील कर चुकी है। इसके बाद 5 नवंबर को उसने हाईकोर्ट में अपनी याचिका पर आगे जोर नहीं देने का फैसला किया।
मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी की पीठ ने याचिका को आगे नहीं बढ़ाने के आधार पर निस्तारित कर दिया। अब कंपनी नए लेबल एफएसएसएआई को सौंपेगी और नियामक उन पर विचार करेगा।
राज्य के राजस्व पर भी पड़ा असर
कंपनी ने पहले अदालत में दावा किया था कि बिक्री पर रोक से महाराष्ट्र के आबकारी विभाग को करीब 350 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। यह आंकड़ा कंपनी की ओर से अदालत में पेश किया गया दावा है।
ओल्ड मॉन्क के अलावा अन्य शराब कंपनियों के उत्पादों के लेबल पर भी एफएसएसएआई ने सवाल उठाए हैं। इनमें मैकडॉवेल्स नंबर-1 बनाने वाली यूनाइटेड स्पिरिट्स भी शामिल है। फिलहाल ओल्ड मॉन्क की बिक्री दोबारा शुरू होने का फैसला नए लेबल और नियामक की मंजूरी पर निर्भर करेगा।
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