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”चर्चा तो है….”

निश्छल भटनागर की कलम से…

 

” नायाब नसीहत ”

नशे से हर कोई है त्रस्त। किसी को होती शराब के नशे की लत। तो कोई सिगरेट और हुक्के के कश की तलाश में। मदमस्त हो जाने को तरसता। कुछ होते ऐसे भी जो सत्ता से करीबी के नशे में डूबे रहते हैं। इतने मदहोश होकर कि सही गलत भी नहीं देखते। पहले पहल तो कर गुजरते हैं। और बाद में हैं भुगतते। चर्चा तो है नशा मुक्ति कि राह में उठाये जा रहे कदमों की। वो भी तब जबकि किसी के घर में हो कोई नशेड़ी तो कैसे होते हैं हालात। बताया ये बीते दिनों कुछ NGOs से जुड़े प्रतिनिधियों ने। और नशे की रोकथाम में केमिस्ट कैसे आ सकते हैं काम। बताया ये अनुभवी लोगों ने। चर्चा है कि हरियाणे के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को एक नपा तुला फीड बैक मिला। वो ये कि जो हैं नशे के दलदल में फंसे हुए। उन्हें निकालने की जद्दोजेहद में जुटे NGOs और केमिस्ट एसोसिएशन के नुमाइंदों से करें संवाद। तय हुई जगह इंद्रधनुष ऑडिटोरियम। यहाँ हजारों लोगों ने आमद दर्ज़ कराई। और नशे के खिलाफ जनांदोलन में सीएम के स्वर से अपनी आवाज़ मिलाई। यहां एक मौका आया, जब सीएम सैनी को प्रोग्रम चलते हुए देर महसूस हुई तो उन्होंने माइक से कहा कि लिखकर दे दीजिए। सबके सुझाव लिए जाएंगे। इस पर कहीं से एक आवाज आई। कि कागज डिब्बे में चला जाएगा। ये सुनते ही सीएम सैनी तपाक से बोल उठे। कागज़ तो डिब्बे में वो भी नहीं जाता, जो हज़ार लोग मुझे रोज़ आकर दे जाते हैं। तो ये कैसे जाएगा। आप लिखकर दे जाएं। इतना सुनते ही नायाब कार्यप्रणाली से वाकिफ लोग तालियाँ बजाने से खुद को रोक न सके। सीएम ने दी नायब नसीहत। युवा नशे से होगा मुक्त, तभी होगा भारत विकसित। और युवाओं को आज मोबाइल से अधिक परिवार से जुड़ने की है ज़रुरत।

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चर्चा तो है ये कि …. मुख्यमंत्री आवास संत कबीर कुटीर में एक भी दिन ऐसा नहीं जाता। जब सैंकड़ों की तादात से लोग मुख्यमंत्री से मिलने। या उन्हें अपनी बात पहुंचाने न आते हों। सीएम आवास से बाहर निकलने वाले। पीठ पीछे कबीर कुटिया के संत की। तारीफों के पुल ही हैं बांधते दिखते। सही मायने में उन्हें नायाब हैं कहते। इतना ही नहीं, सीएम ने एक और काम ऐस कर डाला जो अभी तक किया नहीं किसी भी मुख्यमंत्री ने। पहली दफा, होम मिनिस्टर का दायित्व भी संभालने वाले सीएम ने। प्रदेश के सभी 394 पुलिस थानों से एसएचओ से की सीधी बात। यहां भी मुद्दा रहा। नशे के खिलाफ जंग और जनांदोलन में एक्टिव पार्टिसिपेशन का। मुख्यमंत्री को सामने पाकर। और उनसे डायरेक्ट आर्डर लेकर नए उत्साह से भरे दिखे SHOs ….. CM साहब से मिले डायरेक्शन को पूरा करने का नया जोश देखने लायक था। चर्चा है कि इस प्रोग्राम को भी सफल बनाने में। सीएम के कम्युनिटी पोलिसिंग और पब्लिक पार्टिसिपेशन के स्पेशल अफसर। तथा पंचकूला के पुलिस कमिश्नर एवं आईजी पुलिस पंकज नैन ही पीछे से एक्टिव मोड में बने रहे। महकमे में चर्चा है कि नशों के खिलाफ IPS पंकज नैन ने खुद भी जंग जैसी छेड़ रखी है। युवाओं को नशे से निकालने में। उन्हें मैराथन के जरिए खेलों की ओर लाने में। रूझान जगाने में। खुद फिट रहकर दूसरों को फिट रहने का सन्देश देने में। नहीं है उनका कोई सानी।

 

” ख़ुदा का नेक बंदा ” 

यूं तो हर जीव को…. प्राणी मात्र को जीवन…. परमपिता परमेश्वर ने है दिया। हर किसी को सोचने समझने की क्षमता। और शक्ति भी दी है। कर्म सबके हैं अलग अलग। तो भाग्य भी है सभी का जुदा जुदा। कोई कुछ कर पा रहा है। तो दूसरा कोई कुछ और। मग़र कुछ लोगों की किस्मत खुद खुदा है लिखता। खुद ही है सुधारता। खुद संवारता। और संजोता भी। उन्हें उस मुक़ाम तक है पहुंचाता। जहां के लिए करे अच्छे कर्म। और बनाए अपना जहान। महान। ऐसी ही एक अज़ीम शख्सियत से रू-ब-रू कराने की। छोटी सी कोशिश करेंगे हम यहां। तो बता दें आपको। हैं वो बड़े ही सरल। मधुर। संजीदा से। काम के ही नहीं, धुन के भी इतने पक्के। कि दिन हो या रात। वर्किंग डे हो या हॉलीडे। काम काम और बस काम ही हैं करते दिखते। मीटिंग्स भी इतनी करते कि सबऑर्डिनेट्स बेशक थक जाएं। मग़र मजाल है कि ये साहब। कभी उफ़ भी कर जाएं। साथी अफसर भी मानने लगे हैं कि…. हो गर ऐसा कोई आपके आस-पास। तो कैसे न बने वो…..बेहद ख़ास लोगों का भी…..खास-उल-खास।

करते हैं चर्चा उनकी….। देश के प्रतिष्ठित रूड़की आईआईटी से पास हुए। मन में था सपना। तभी दिया UPSC एग्जाम 1987 में। प्रीलिम्स पास करके मैन्स दिया, इंटरव्यू तक पहुंचे, मग़र मार्क्स कर रहे। तो चुने नहीं गए। फिर 1988 में दी UPSC परीक्षा। प्रीलिम्स, मैन्स और इंटरव्यू दिया। मग़र लिस्ट में नाम लाने से चूक गए। मन निराश हो गया। लगा कि खुद में UPSC क्लियर करने का दम नहीं। तब नौकरी शुरू की MES में। मन रम गया….वहीँ। किराए के मकान में रहते। तय कर लिया था। कि अब यही है जीवन-चर्या। तभी हुआ कुछ अलग सा। एक दिन उनके किराए के कमरे में एक अपरिचित। अचानक आए। बहुत सोचा, मग़र अंखियां अपनी उन्हें पहचान ही न पाएं। वो ज़रा सा मुस्काए। और बोले, ये दूसरी नौकरी है क्या। अपरिचित सज्जन को जवाब मिला, नहीं जी पहली। तपाक से बोले वो। पहले एक कार खरीदोगे आप। फिर करोगे दूसरी नौकरी भी। इतना कहकर वो अपरिचित कमरे से बाहर। समझ नहीं आया कुछ भी। खैर, समय का पहिया घूमता रहा। बजाज सुपर स्कूटर से ऑफिस आते जाते। चैन की बंसी बजाते। कार कि ज़रूरत भी नहीं थी। मग़र तभी एक मौका वो भी आया। जब ऑफिस में मारुति कार की बुकिंग का अवसर आया। तब मारुति कार बुकिंग करके ही खरीदी जा पाती थी। बिन बुकिंग सब बे-नतीजा….बे-कार। अचानक याद आई। उन अपरिचित सज्जन की कही हुई बात। पहले खरीदोगे कार। फिर बदलोगे नौकरी। उनकी बात सूट करती दिखी। तुरंत मारुति कार की बुकिंग करा ली। थोड़े से पैसों से। कार आने के साथ ही आई याद। उन अपरिचित की वो बात कि…. नौकरी भी बदलनी होगी। तब सोचा कि MES से अच्छी नौकरी तो सिर्फ UPSC की ही होगी। फिर चाहे IAS हो या IFS, IPS या फिर IRS बनने की….।

उन सज्जन की बातों ने किया ऐसा असर कि मन लग गया। जज़्बा जग गया। कुछ नया कर गुज़रने की इच्छा पैदा हो गई। साहस का नव संचार हो गया। इस बीच 1989 में UPSC का एग्जाम नहीं दिया और करते रहे प्रेपरेशन। तैयारी हुई मुकम्मल। तब 1990 में दी देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित परीक्षा UPSC…. प्रीलिम्स, मैन्स और इंटरव्यू भी किया पास। नाम आया सफल परीक्षर्थियों में। हुआ सिलेक्शन। बन गए आम से ख़ास…. IAS बनकर करने लगे सेवा। सोचा न था कभी कि बन सकेंगे प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी। क्योंकि कैडर में ऊपर के बैच में ही थे। इतने प्रतिभावान। कि सूबे की सबसे ऊंची कुर्सी तक हाथ पहुँच ही न पाते। तब सामने आया एक और मौका। और काम से मिली पहचान ने बना दिया। उस अवसर को सुनहरा। चंद रोज़ के लिए ही सही। चीफ सेक्रेटरी के कमरे के बाहर। और अंदर इंकम्बैंसी बोर्ड पर। दर्ज़ हो गया नाम बनकर सुनहरा सितारा। दिन गुज़रे। बोर्ड पर एक और नाम लिख गया नया। पर कहते हैं न कि…. किस्मत लिखी तो ख़ुदा ने ही है। सो माहौल बदला और फिर चमक उठा नाम का सितारा। दूसरी मर्तबा मिला मौका। सबसे ऊंची कुर्सी पे बैठकर प्रदेश की सेवा का। फिर चमकी किस्मत और मिल गया सेवा विस्तार। छह मह का एक्सटेंशन। इस बीच अचानक ही तबियत बुरी तरह से गड़बड़ाई। ओपन हार्ट सर्जरी तक की नौबत घिर आई। मग़र वो कहते हैं ना….कि कोई अदृश्य शक्ति है। जो इस जहान में सब कुछ चलाती है। बिगड़े काम बनाती है। सबको मंज़िल तक पहुंचाती है। वही देती है मन को साहस और दिल को सहारा। मिला गॉड गिफ्ट और तबियत ऐसे सुधरती गई। जैसे चन्द्रमा की कलाएं। शुभचिंतकों की मंगलकामनाओं से हुए बिल्कुल स्वस्थ।

चर्चा है कि….किस्मत की बुलंदी इसी बात से समझिए। स्वस्थ होकर। पहले घर से चलाते रहे दफ्तर। फिर दफ्तर में डटकर। जन जन तक पहुंचाते रहे। सरकारी योजनाओं का भरपूर असर। यही बात कई करोड़ प्रदेशवासियों के भाग्य विधाता को। भा गई। जंच गई और विपरीत सी दिखने वाली परिस्थितियों में। किस्मत फिर से एक बार दरवाज़ा खटखटा गई। चर्चा है कि….पूछा गया उनसे। क्या आप कर सकते हैं काम। तो कैसे…. कह दे कोई भी…. नहीं। सो तपाक से साहब ने भर दी हामी। और इसी के साथ इतिहास में हो गया नाम दर्ज़। रिटायरमेंट के बाद दूसरी बार साहब को। मिल गया एक्सटेंशन। देश में ऐसा दूसरा मामला किसी चीफ सेक्रेटरी के साथ हुआ। यूपी में चीफ सेक्रेटरी रहे दुर्गा शंकर मिश्रा को तीन बार एक्सटेंशन मिला था। ऐसे में दूसरे अफसरों को। चकित करके। तमाम दुनियावी ताकतों को धता बताकर। तब कहलाए ईश्वर के सच्चे कृपा पात्र। छिड़ गया तब चर्चाओं का बाजार। तब कहलाए…. ख़ुदा का नेक बंदा।

 

” थोड़ा सा….संजीदा हो जाएं ”

आप ही बताइए ज़रा। जान की भी कोई क़ीमत लगाई जा सकती है क्या। ज़िंदगी तो हर किसी की है बेशक़ीमती। उस पर मामला अगर सरकारी मुलाज़िम का हो। तो, कहते हैं कि पूरी कायनात। या यूं कहें कि पूरी  सरकार लग जाती है….जान की बाज़ी लगाने वाले मुलाज़िम पर प्यार बरसाने में। उसको बनता हक़ दिलाने में। परिवार को संभालने में। उन्हें एहसास दिलाने में कि…. हम हैं आपके साथ। दुःख की इस घडी में….हर कदम आपके पास। अमूमन हर प्रदेश की सरकार इस मुआमले में छोड़ती नहीं। कोई भी कोर कसर। मग़र यह क्या, यहाँ तो किस्सा ही दीखता है बे-असर। अपने फ़र्ज़ के लिए जान की बाज़ी लगा चुके जांबाज़ों के परिवार ही। लगा रहे हैं पुकार। दर – बदर होकर। घर- घर। शांत सी, एकदम मर्यादित सी…. पुकार। कि सुन लीजिए नायाब सरकार। सबके चेहरों पर मुस्कान बिखेर देने वाले। अपने अपने से। लगने और दिखने वाले। पौने तीन करोड़ हरियाणवियों के दुलारे। दोस्त तो दोस्त। वैचारिक दुश्मनों के भी मन बसिया। उनके दिलों में भी जगह बना लेने वाले। हर दिल अज़ीज़….सीएम नायब सिंह सैनी सरकार…. हमें है आपसे एक ही दरकार। कि सुन लो उन परिवारों की भी….करुण पुकार। जो गुज़रे चार बरसों से कर रहे दीन- हीन होकर यही इंतज़ार। कि कब सुनी जाएगी उनकी भी पुकार। कुछ परिवार तो ऐसे भी हैं जो कि…. एक एक पैसे को तरस रहे सरकार।

चर्चा तो है…. कि जिन परिवारों के कर्ता- धर्ता कोरोना पीरियड में। फ़र्ज़ निभाते हुए जान गंवा बैठे। वो आज भी हैं बेबस। उम्मीद की टकटकी लगाए हुए। बाट जोहते हुए। यही सोचते हुए। कि उनको भी सुना जाएगा। आएंगे उनके भी अच्छे दिन। एक न एक दिन। और आएगी ज़रूर चिट्ठी उनके भी नाम की। कि ड्यूटी अंजाम देते हुए दिया उनके अपनों ने। अदम्य साहस और वीरता का परिचय। जब देश दुनिया अपने घरों में थी दुबकी बैठी हुई। तब सड़कों पर निकलकर निभाई थी ड्यूटी। फिर हो वो कैसी भी। सरकरी सिस्टम में ऊपर से मिले आदेशों और निर्देशों का। अक्षरशः अनुपालन सुनिश्चित करवाने में। लड़ बैठे उस अदृश्य शत्रु से। जो था जान का दुश्मन। न आँखों से दिखता। नज़रों से तो एकदम ओझल ही रहता। पर अंदर ही अंदर प्राण चेतना को हर लेता। चलते फिरते मानव को निर्जीव बना देता। माटी से बने मानव शरीर को माटी में ही मिला देता। चर्चा है कि…. ऐसे 23 परिवारों को अपने नसीब खुलने का बना हुआ है इंतज़ार। ये वो परिवार हैं जो सरकारी दफ्तरों में कागज़ों का पेट भर पाने में रह गए लाचार। और देखते ही देखते बीत गए चार बरस। उन्हें अब तक भूली ही बैठी है सरकार। आखिर क्यों। जबकि तथ्य यही है कि….तत्कालीन सीएम मनोहर लाल ने सिद्धांततः मान लिया था यही कि…. सरकारी ड्यूटी करते वक्त। जान किसी कि भी गई हो…. क्या छोटा क्या बड़ा। मिलेगा उसे न्याय एक ही जैसा। उस फाइल पर तत्कालीन होम मिनिस्टर अनिल विज ने भी यही माना था। कि जान की अलग अलग कीमत कैसे आंकी जा सकती है। कैसे बाईफरकेट है किया जा सकता कि किसे मिलेगा 5 लाख और कौन पाएगा 20 लाख। ये तो जान गंवाने वाले और उसके परिवार के साथ अन्याय ही होगा ना…..।

तब हुए इन- प्रिंसिपल फैसले अनुसार, सभी प्रभावित परिवारों को…. 5 की बजाए मिलेंगे एक जैसे 20 लाख रुपए। जान तो किसी की वापस नहीं लाई जा सकती, मग़र…. हर प्रभावित परिवार के दर्द को एक जैसा समझा माना ज़रूर जा सकता है। लेकिन इतने के बाद भी सिस्टम की चक्की में फंस कर – पिस कर रह गई वो फाइल। और साल दर साल उस के मजमून पर। पड़ती रही धूल की मोटी परत। अब प्रभावित परिवारों को है हरमन प्यारे…. चेरों पर मुस्कान ला देने वाले नायाब मुख्यमंत्री…. नायब सिंह सैनी की एक नज़र का इंतज़ार। ये भी है सर्व विदित कि…. पता चलेगा जैसे ही उनको…. फाइल मंगवाएंगे झट से और ला देंगे। चार बरस से 23 परिवारों के अनगिनत चेहरों पे मुस्कान। तथ्य बताते हैं कि कोविड काल में काल- कवलित हुए तमाम कर्मचारियों में से कुछ की। जान की कीमत लगाई गई 5 लाख रुपए। तो कुछ को 20 लाख रुपए देने लायक आंका गया। पेंच यहीं फंस गया। ये भी नहीं सोचा गया कि अब 5 लाख दो यो 20 लाख रुपए। जान तो वापस आने से रही। हाँ, इतना ज़रूर है कि ज्यादा मिले पैसों से उन परिवारों के बच्चे। अच्छे से पढ़ लिख जाएंगे, कुछ कर पाएंगे। मन में ये तो नहीं लाएंगे। और ये तो नहीं सोचेंगे कि। होती उनकी भी अगर सिफारिश तो। एक जैसे मृतक आश्रित होने के बावजूद। उन्हें भी मिल जाते 20 लाख रुपए। 

चर्चा उस दिलचस्प तथ्य ये कि….प्रदेश सरकार के एक मंत्री महोदय के पीएसओ और कुक का परिवार भी पा चुका है 20 – 20 लाख रुपए। इसे जानते हुए जब बाकी मामलों में भी मांगा गया रिलैक्सेशन। और याद दिलाया गया मंत्री जी का कनेक्शन तो। जिम्मेवार अफसरों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के सैद्धांतिक निर्णय को लिया सिर आँखों पर…. मग़र सरकारी बाबुओं को आने लगीं छींकें। पता नहीं क्यों। और सम्बन्धित फाइल में काग़ज़ का पेट दिखा दिया गया खाली। ऐसे में प्रभावित परिवारों के सदस्यों की आस भी टूटती रही। और खाने की थाली भी सूनी रही। जबकि सरकार की ओर से ये मुआवजा राशि…. मिलनी भी कोविड काल के मृतक आश्रित परिवारों को है है। वो भी डीबीटी के ज़रिए…. फिर भी न जाने क्यों सरकारी बाबू। दर्द में आकंठ डूबे इन 23 परिवारों पर दया नहीं दिखा रहे। सहानुभूति नहीं जता रहे। संवेदना प्रकट करने की बजाए अब भी उन्हें सताए जा रहे। ये भी नहीं समझ पा रहे कि। अपनी इस अदनी छद्म कोशिश से। हरियाणे के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की बेदाग़ छवि को धूमिल कर रहे। उनकी साख को बट्टा लगा रहे। दर्द में पुकार रहे लोगों को….  गले लगाने का मौका खुद मुख्यमंत्री से है छीन रहे। तभी पड़ी ज़रुरत ये एहसास कराने की कि। थोड़ा सा…. संजीदा हो जाएं।

 

” चौधरी साहब की ख़ातिरदारी ”

यूं तो सरकार के सभी विभाग हरदम एक्टिव से ही दिखते हैं। कुछ महकमे अलर्ट मोड पर रहते हैं। लेकिन समाज से कटा हुआ रखे जाने वाले। और दरकिनार माने जाने वाले एक विभाग में इन दिनों। रह रहकर बड़ों की आमद तेज होती है दिख रही। चर्चा हर कोई है कर रहा। क्या चौक चौराहा। या दफ्तर – घर। हर जगह सिर्फ एक ही बात कि अगला कौन। ये और है कि खुलकर कोई बात नहीं करता। ऐसी सूरते हाल में…. संकेतों में हो रही हैं बातें। कैसे हैं फलां….चौधरी साहब। महकमे में भी बड़ों के आने का सिलसिला देखते हुए। इंतज़ाम चाक चौबंद करवाने का है इशारा। गद्दे मंगवा लो। तख्त या बेड ठीक है या नहीं। चेक करवा लो। पानी आरओ का न हो तो कर लो। पुख्ता इंतज़ाम। लाइट- पंखा वगैरह….दिखवा लो।

चर्चा है कि…. कभी भी उस माहौल में न रहने वालों के लिए। कभी भी उस तरफ न झाँकने वाले ”बड़ों” के चलते। हर किसी की है उधर….सूक्ष्म नज़र। सुरक्षित सुलभ बनाया जा रहा है अब तक रहा….उपेक्षित स्थल। कइयों की बड़ी निगाहें लगी हैं वहां। माहौल पर लगी हुई है टकटकी। मैसेज है कि …. ध्यान रखना, चौधरी साहब की खातिरदारी में। रह न जाए कहीं। कोई कमी। याद रखेंगे वो। बिना भूले। इसलिए खुद भी रहो मुस्तैद। और बाकियों को भी रखो अलर्ट। ये तत्परता इसलिए भी है। क्योंकि कुछ समय पहले….बड़ी राजनीतिक शख्सियतों का हुआ यहाँ आना जाना। वो भी दूसरी विचारधारा वाले राजनेता। आए थे मिलने अपने हमराही को। हमसफर को। ऐसे में तीसरी नज़र का मुस्तैद होना तो है ही लाज़िमी। नाम कोई नहीं ले रहा। बहुत कुरेदो तो यही है कह रहा। कसर न रह जाए कोई। पगड़ी उछल न जाए कहीं। आखिर बात है चौधरी साहब की खातिरदारी से जुड़ी।

 

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