निश्छल भटनागर की कलम से…
”राम नाम की लूट थी, लूट लिया”
एक नाम जो मरते व्यक्ति को भी देता है सहारा। वो है ”राम” का नाम। भक्ति काल में जन्मे। संत कबीर दास ने कहा था। ”राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहि जब छूट।” प्रभु श्रीराम की भक्ति में डूबे। संत कबीर का ये दोहा। दुनिया भर के लोगों को लगभग एक जैसा अर्थ बताता है। कि अभी जीवन में प्रभु का नाम रुपी खज़ाना खुलेआम लुट रहा है। जिसे जितना लूटना है, लूट ले। प्रभु के नाम की महिमा का आनंद लें। यदि आप इस अवसर को चूक गए तो। अंत समय में, जब प्राण शरीर से छूट जाएंगे, तो। केवल पछताना ही पड़ेगा। संत कबीर की बाणी को कुछ जिम्मेदार व्यवस्थापकों ने। अपनी ज़रुरत के हिसाब से किया परिभाषित। और लूट सके तो लूट ले। को ही सिद्धांत मान कर। बनाकर लूटना शुरू कर दिया। करोड़ो आस्थावान हिन्दुओं की खून पसीने की कमाई से। दी गई धन धान्य रुपी दी गई प्रेमांजलि। स्नेहांजलि और प्रभु चरणों में समर्पित की गई राशि। और चढ़ाये गए सोना चांदी, हीरे मोती। बेशकीमती जवाहरात और अन्य बहुमूल्य साजो सामान को। सरे आम लूट लिया। गुप्त दान गुप्त तरीके से उड़ा लिया। चुरा लिया और। प्रभु के घर से चुराकर। अपना घर खड़ा कर लिया। इतना सब कुछ सिलसिलेवार ढंग से। गायब होने के बाद भी एक भी एफआईआर दर्ज़ नहीं कराई गई। आखिर क्यों। इतिहास गवाह है कि, लगभग 500 वर्षों के लम्बे कानूनी और। सामयिक व्यावहारिक संघर्ष के बाद बनाए गए राम मंदिर से। ऐसी चोरी की कल्पना। सोच से परे है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चोरी के सूत्रधार तक पहुँचने। इस घृणित कार्य में शामिल लोगों का नाम खोज निकालने। जिम्मेवारी फिक्स करने के लिए एसआईटी बना दी। जांच की रफ़्तार बढ़ रही है। नाम खुल रहे हैं। चोरी के सबूत जुटाए जा रहे हैं। कड़ियाँ जोड़ी जा रही हैं। सब कुछ सामने आने को है। चर्चा है कि, रिपोर्ट जो भी आए। मगर अब कोई भी पुराना व्यक्ति। व्यवस्था के नाम पर मंदिर परिसर में। दोहराया न जाए। उसे मौका न दिया जाए। कि अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा को। पाने का मौक़ा मिल पाए। चर्चा है कि, प्रभु श्रीराम जन्मभूमि निर्माण समिति के चेयरमैन एवं पूर्व आईएएस नृपेंद्र मिश्रा। अब मीडिया को बुला बुला कर अपना पक्ष। अपनी बात कह रहे हैं। सब समय समय की बात है। राम मंदिर में चढ़ावा गड़बड़ी की थाह ले रही। सच ढूंढ रही एसआईटी ने। शक के दायरे में आए। लोगों से कहा है दो टूक। बिना पूछे, अयोध्या न छोड़ें, मोबाइल भी ऑफ न करें। चर्चा ये भी है कि, राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव। चम्पत राय के ऊपर बड़ी जिम्मेदारी थी। मंदिर निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास। समय समय पर बीमार रहते हैं, ऐसे में। बड़ी जिमेवारी थी चम्पत राय के सिर। चम्पत राय से निर्माण में गड़बड़ी की शिकायतें भी की जाती रहीं, लेकिन। चम्पत राय ने खुलकर विरोध नहीं किया। चर्चा यही है। सत्य और तथ्य यही है। कोई अपनी जिम्मेवारी से बच नहीं सकता। फिर वो कोई भी, क्यों न हो। राम के मंदिर से चोरी करने वाले। इस समाज, सरकार और कानून से बेशक बच जाएं। मगर श्रीराम भक्त चिरंजीवी भगवान हनुमान से बच नहीं सकते। हनुमान जी की गदा, ”कौमोदकी” से तो कतई नहीं बच पाएंगे। दृश्य अथवा अदृश्य रूप से वो पड़ेगी ज़रूर।

”कबीर कुटीर का संत”
भक्ति काल में जन्मे कबीरदास। मौजूदा समय में अत्यंत प्रासंगिक होते दिख रहे हैं। उनकी बाणी, उनके दोहे। खूब पढ़े, लिखे और शेयर किये जा रहे हैं। दो सूबों की राजधानी। सिटी ब्यूटीफुल, चंडीगढ़ में एक कोना है, जो ”संत कबीर कुटीर” के नाम से है। पहचाना जाता, जाना जाता, पुकारा जाता। ये है मुख्यमंत्री आवास, हरियाणे के सीएम नायब सिंह सैनी का। जैसा नाम, वैसा काम। नायब का हर काम, हर अंदाज़। बनता दिख रहा है नायाब। और संत कबीर कुटीर में आने वाला तकरीबन हर कोई। उनकी कार्य शैली, जीवन शैली, वाक शैली का। होता दिखता है मुरीद। एक ऐसा मुख्यमंत्री, जिसके घर के दरवाजे किसी के लिए बंद होते ही नहीं। ख़ास तौर से फरियादी के लिए। दुखियारे के लिए। कष्ट में डूबे, पीड़ा से भरे व्यक्ति के लिए तो। कभी नहीं, कतई नहीं। अब जबकि इस कबीर-कुटिया में पड़ोस के बाशिंदों का। आना जाना, घुलना मिलना, परेशानियां सांझा करना। बढ़ने लगा है तो निश्चित रूप से बड़े भाई के लिए। चुनौतीपूर्ण होता दिखने लगा है। नायब सिंह सैनी की पंजाब में होने वाली नायाब एंट्री ने। बढ़ती धमक ने पंजाब की सत्तारूढ़। आम आदमी पार्टी के जिम्मेवारों को विचलित जरूर है कर रखा। चर्चा है कि, खुद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी कह चुके हैं कई मर्तबा। उनके कार्यक्रमों को रोकने। बढ़ा कड़ी करने। अवरोध लगाने। काले झंडे दिखाने। रैली या सभा सभा स्थल के पास गड्ढा खोद देने। रास्ता ब्लॉक करवा देने। जैसी बचकानी हरकतों से। जब उनके इरादों को रोका न जा सका तो अब। खुद में सुधार करते हुए जनता के बीच जाना कर दिया है शुरू। चर्चा है कि, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान का गाँव के बीचो-बीच सैंकड़ों हजारों लोगों की इकट्ठ में। सरकार के काम बताना। उपलब्धियां गिनाना। विरोधियों को आईना दिखाना। भीड़ जुटाना। ये ज़ाहिर करता है कि सरकार। अब फिर से जनाधार जुटा रही है। लोगों के बीच जा रही है। लेकिन बात इससे भी बड़ी है, खड़ी हुई। वो है बेअदबी से जुडी हुई। शिरोमणि अकाली दल कहता है कि बेअदबी हुई। सरकार के मंत्री, नुमाइंदे और प्रवक्ता। यहाँ तक कि खुद मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान भी हैं कहते। वो वीडियो ही है नकली। दिखता है जो। वो मैं नहीं। खुद को सुधारे बगैर। नशे के विरुद्ध चलने वाले अभियान का क्या काम। इन सबके बीच, पंजाब के कई इलाकों में ये बात है सुनी सुनाई जाती कि। शराब को लेकर जिसे नहीं रहता अपना मान। वो कैसे कायम रख सकता है सूबे का स्वाभिमान। बात चिंताजनक है। और जवाब देना। अब मजबूरी से बढ़कर। सरकार के लिए आवश्यक हो गया है। जनता के बीच जाने का। हाथ जोड़ने का समय निकट आ रहा है। चुनावी माहौल पनप रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी पोलिटिकल पार्टी के अध्यक्ष। नितिन नबीन ने। पंजाब में डेरा डाल दिया है। मान सरकार के विरोधी दल मोर्चेबंदी कर चुके हैं। अकाली दल के साथ ही कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष राजा अमरिंदर सिंह वड़िंग भी। बेअदबी से जुड़े मामले पर सरकार को कटघरे में कर रहे हैं खड़ा। ऐसे में चुनौती पार पाना नहीं है उतना आसां। और पंजाब की अवाम की करें बात तो। उसे तो चाहिए रंगला पंजाब। जैसे नायब सिंह सैनी की अगुवाई में दिनों दिन बढ़ रहा। हरा भरा हरियाणा।
”कॉकटेल….ये हानिकारक है !”
सेटिंग तो हो सकती है। किसी की, किसी से भी। तो क्या हुआ, जो एक आल इंडिया सर्विस अफसर की। हो गई पॉलिटिकल पार्टी आलाकमान से सीधी। देखा जाए तो अच्छा ही है। स्टेट के चीफ मिनिस्टर। और दूसरे माननीयों, सीनियर्स और पॉलिटिशंस की। अनावश्यक कृपा या दया दृष्टी से। मिल गया छुटकारा। नतीजा ये कि अब कोई नहीं रखता अहमियत। नज़र में इनकी सिर्फ धन-दौलत-ताकत। पर इनकी इसी सोच ने करवा रखी है। पूरे प्रदेश में इनकी जमकर मजम्मत। इतने के बाद भी। हो हिम्मत किसी में, तो पूछ ले। डायरेक्ट हाई कमांड से। लेकर नाम हमारा। इस वाकये में, यहाँ तक तो। दिखता है सब मैनेजेबल। मगर तब क्या। जब हरकतें। हो जाएँ क्वेश्चनएबल। चर्चा तो है, कि वो हैं एक महिला अफसर। सामान्य महिलाओं जैसे उनके शौक। पसंद नापसंद तो हैं, मगर। आम महिला वाली संवेदनाएं, भावनाएं और जज़्बात। मिजाज़ से कतई मेल न खाते। ये भारी भरकम लफ्ज़। उनके लिए। फ़क़त अलफ़ाज़ ही रह जाते। चर्चा है कि, जिस महकमे कि हैं। वो आला अफसर। उसे निंचोड़ा जा रहा है कसकर। डिपार्टमेंट के मुलाजिम ही हैं कहते। वसूली होती खुलकर। यकीं मानिए, डंके कि चोट पर। इन सबके बीच, इक वाकये ने खींच लिया ध्यान। जो सुना हमने भी, लगा कुछ हटकर। हुआ यूँ कि, विभाग की एक अफसर की। थी मजबूरी, रहा होगा ज़रूरी। करवाना होगा अपना ट्रांसफर। तमाम कोशिशों के बाद। जैसे तैसे पूछते, बतियाते। पहुँच गईं मैडम उन अफसर के सामने। बहुत की मिन्नतें, खिदमतें। प्रयास रहे, सभी बेअसर। मग़र, तभी पड़ी नज़र। उनकी कलाइयों पर। चर्चा है कि, महिला अफसर ने पहन रखे थे। सोने के कड़े- कंगन। मग़र पैसों से मजबूर रही सुहागन। आ गई ईमानदारी आड़े। और गड़ गई वहीँ, अफसर की तिरछी नज़र। रकम न चुकाने की एवज में, उतरवा लिए। झटक लिए सोने के दोनों कंगन। और तुरंत कर दिए साइन। महिला अफसर का ट्रांसफर आर्डर। चर्चा है कि रूम से बाहर निकलते वक़्त। महिला अफसर कीआँखों से बहती गंगा जमुना को। पोंछने हटाने के फेर में पड़ गई निचले कर्मियों की नज़र। भांप गए माज़रा पूरा। चुगली कर गईं सूनी कलाइयां। गवाही दे गईं दिनदहाड़े डकैती की। वो भी सरकारी अफसरों के गलियारे में। चर्चा है कि, महकमे को तो छोड़िये। पूरे सूबे के बाफ़िक्र बाशिंदों को। है इस बेग़ैरती की खबर। रिश्वत न देने पर कलाइयां सूनी कर डालने की जिकर। मग़र, सीएम साहब जान कर भी हैं बेखबर। मामला जो है ज़रा हटकर। सीधी सेटिंग से हैं, बखूबी खबरदार। इसी करके हाथ भी हैं बंधे हुए। आलाकमान की रेहनुमाईं में एकदम कसे हुए। लेकिन पूरे प्रकरण पर उभरी। ख़ामोशी से हो रही है चहुँ ओर, थू थू। चल रही हैं चर्चाएं ऐसी कि। मौजूदा सरकार में ही है ये मेहरबानी। बदल गई थी पार्टी। तो कटवा ली थी इन्होने। सूबे से बाहर की टिकट। साउथ में मौज काटी पूरे पांच साल एक महीना। फिर वर्तमान सरकार में अवतरित। पॉलिटिकल पार्टी बदली और बदल गए। इनके हालात। अब नब्ज़ पे है अंगुली। पर, दुनिया की नज़र में। राजनीतिक पार्टी से वास्ता रखने वाले अफसरों की। कॉकटेल, ये है हानिकारक। इस बारे में क्या कहते हैँ आप।
”विदेश न जा पाने की कसक”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सलाह ने बदल दी। देश भर की विचारधारा। ख़ास तौर से उन सूबों की, जहाँ फहरता है भगवा म्हारा। लेकिन प्रधानमंत्री की सोच से इत्तेफ़ाक़। नहीं रखते सारे। उत्तरा भारत के अफसर बहुतेरे। पीठ पीछे निकालते है खुन्नस सारे। अपने सबोर्डिनेट्स पर। निचले कर्मचारियों पर। महकमे पर। और हर उस पर, जो दिखता है कमज़ोर। हरियाणे में तो बोलते है ऐसे लोगों को। अंत्योदय वाले। ऐसे ही एक अफसर की महिमा है न्यारी। ऊपर तक पहुँच है सारी। सब हैँ जानते। अच्छे से पहचानते। तभी हैँ ये ज़ुर्रत करते। बिना माई बाप के तो। सीनियर्स के सामने इनके अलफ़ाज़ भी न निकलते। चर्चा है कि, जाना था इन्होने फॉरेन टूर पर। मग़र, प्राइम मिनिस्टर ने कर दिया। इनका प्रोग्राम चौपट। रिक्वेस्ट ऊपर जाकर हो गई रिजेक्ट। पहुँच भी न आई काम। अपने ठिकाने से दिल्ली तक। किया जानने वालों को खूब सलाम। दिखा दी गई एसओपी और। थमा दिए गए चीफ सेक्रेटरी के स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शंस। इन आर्डर ने जैसे छीन ली। अफसर की सुध-बुध सारी। ईंधन बचाने के लिए लिया गया था फैसला, मग़र इन जनाब ने पूरे प्रदेश के सारे मातहत। अफसरों को बुला डाला अपने द्वारे। लाखों का ईंधन फूंक पहुँच गए सारे। चर्चा यही चलती रही उनमें। किस बात की ईंधन की बचत। और कैसी बुलावे में कटौती। दो दिन तक महकमे के अफसरों को छकाने के बाद भी। मन न भरा तो लगे फटकारने। हिसाब किताब लेने। या यूँ कहें कि चुकता करने। ना किसी का लिहाज। न किसी की शर्म। और तो और महिला अफसरों के भी निकलवा दिए आंसूं। हरियाणे की नायब सिंह सैनी की सरकार में महिलाओं को बिठाते हैँ सर-माथे। देते हैँ इज्जत। मान सम्मान सारे। मग़र इनको कौन समझा-रे। चर्चा है कि महकमे के लिए काम करने वालों से ही। बाहरियों से गाँठ रखी है दोस्ती। बना रखे हैँ मधुर ताल्लुकात। जो देते हैँ हरदम साथ। घर हो या बाहर। ऐसे ही एक के साथ था। सात समुन्दर पार का कार्यक्रम, जो गया बिगड़। चर्चा ये भी कि दूसरे महकमों में। कस रखी है कमर और। निकाला जा रहा है फंस जाने वालों का कचूमर। ये भी है चर्चा कि सीएम तक। पहुँच चुकी है खबर। मग़र बचाने वाले, मझधार से। निकालने वाले हैँ मुस्तैद। हर बार की तरह, इस बार भी। बदले गए अगर तो ये पाएंगे फिर से मलाईदार पोस्ट। ऊपर बैठे आका ने। ले रखा है जैसे, ठेका इनका। आने नहीं देते, असर खरोंच कोई। सूबे में रहें या जाए। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर, हर जगह हेलीकाप्टर बनकर। मंडराते रहते हैँ इनके सिर पर। मग़र, ताज़ी चर्चा यही है कि, विदेश न जा पाने की कसक में। रिटायरमेंट की दहलीज़ पर बैठे मातहतों को। जैसे कर रहा है ये ओफिसर परेशान। निकलवा रहा है महिला अफसरों के आंसू। भरी मीटिंग में। उससे उसकी न्यायप्रियता। निष्पक्षता और। सर्विस को लेकर खाई गई। ली गई। उठाई गई निष्ठा और। निष्पक्षता की शपथ का भी निकल रहा है दम।
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