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ईमानदारी की कीमत परिवार ने चुकाई, बार-बार तबादलों से बेटे की पढ़ाई और पत्नी का करियर प्रभावित

IAS तुकाराम मुंढे का खुलासा, हर साल बदलना पड़ा बेटे का स्कूल; पत्नी की डिलीवरी के खर्च के लिए बेचनी पड़ी पुश्तैनी जमीन

न्यूज़म ब्यूरो

मुंबई, 07 नवंबर। महाराष्ट्र कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के आयुक्त तुकाराम मुंढे ने अपने बार-बार होने वाले तबादलों और उससे परिवार पर पड़े असर को लेकर दर्द बयां किया है। एक मराठी समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि तबादलों के कारण पत्नी के करियर से लेकर बेटे की पढ़ाई और परवरिश तक प्रभावित हुई। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि मुंबई में पत्नी की दूसरी डिलीवरी के दौरान अस्पताल का खर्च उठाने के लिए उन्हें पुश्तैनी जमीन का एक हिस्सा तक बेचना पड़ा। उन्होंने कहा कि ईमानदारी और सिद्धांतों से समझौता किए बिना इन मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

हर तबादले के साथ पत्नी को बदलनी पड़ी नौकरी

मुंढे ने बताया कि सरकारी तबादला केवल अधिकारी के स्थान परिवर्तन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार को नई परिस्थितियों में ढलना पड़ता है। हर बार तबादला होने पर उनकी पत्नी को भी नौकरी बदलनी पड़ी। नई जगह पर दोबारा काम शुरू करने और अपने लिए अवसर तलाशने के कारण उनके पेशेवर करियर पर असर पड़ा। परिवार को लगातार नए शहर और अलग सांस्कृतिक माहौल में रहने की चुनौती भी झेलनी पड़ी।

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हर साल बदला स्कूल, दोस्त बनाने का मौका भी नहीं मिला

मुंढे के मुताबिक, बार-बार तबादलों का सबसे ज्यादा असर उनके बेटे की पढ़ाई और मानसिक स्थिति पर पड़ा। बेटे को शुरुआती पांच-छह वर्षों में लगातार स्कूल और शहर बदलने पड़े। मुंबई में सीनियर केजी के बाद पहली कक्षा सोलापुर, दूसरी पुणे, तीसरी नासिक, चौथी नवी मुंबई और पांचवीं कक्षा फिर मुंबई में पूरी करनी पड़ी। इस दौरान वह किसी एक जगह स्थायी दोस्त भी नहीं बना सका।

बस का शोर भी बना परेशानी, झेलना पड़ा कल्चरल शॉक

मुंढे ने बताया कि मुंबई में उनका बेटा घर के पास स्थित स्कूल में पढ़ता था। सोलापुर में उसे स्कूल बस से भेजने की कोशिश की गई, लेकिन उसने इनकार कर दिया। बेटे का कहना था कि बस में दूसरे बच्चे बहुत शोर मचाते थे, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पाता था। मुंढे के अनुसार, हर शहर का माहौल और संस्कृति अलग थी। बार-बार स्कूल और परिवेश बदलने से बेटे को कल्चरल शॉक का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि बच्चे के जीवन के शुरुआती पांच-छह साल इसी बदलाव से तालमेल बैठाने में बीत गए। इस नुकसान की भरपाई संभव नहीं है।

चर्चगेट में रहने के लिए दो लोगों को करनी पड़ी नौकरी

मुंढे ने अपनी शुरुआती मुंबई पोस्टिंग के आर्थिक संघर्ष का भी जिक्र किया। 2005 बैच के आईएएस अधिकारी के रूप में वर्ष 2010 में उन्होंने खादी बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर काम किया था। उस समय उनका परिवार चर्चगेट में रहता था, जहां रहने का खर्च काफी अधिक था। उनका बेटा तब महज एक साल का था। उन्होंने बताया कि महीने के अंत तक अक्सर बैंक खाते में पैसे नहीं बचते थे। परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्होंने और उनकी पत्नी ने दोनों के काम करने का फैसला किया।

पत्नी की डिलीवरी के लिए बेचनी पड़ी पुश्तैनी जमीन

मुंढे ने बताया कि आर्थिक तंगी का सामना उन्हें इस हद तक करना पड़ा कि पत्नी की दूसरी डिलीवरी के समय अस्पताल का खर्च उठाने के लिए पुश्तैनी जमीन का एक हिस्सा बेचना पड़ा। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी गलत या अनैतिक रास्ता नहीं अपनाया। पत्नी के सिद्धांतों और संयुक्त परिवार के सहयोग ने भी मुश्किल दौर में उनका साथ दिया। उनके मुताबिक, लगातार तबादलों और आर्थिक संघर्ष का असर केवल उनके जीवन पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार पर पड़ा।

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