महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स से जुड़े मामले की सुनवाई में कोर्ट ने गुजरात की शराबबंदी का उदाहरण दिया, कहा- प्रतिबंध से राजस्व में कमी, अवैध कारोबार और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं
राहुल गुप्ता
नई दिल्ली, 19 सितंबर।
देश में शराबबंदी को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने शराब पर पूर्ण प्रतिबंध के संभावित प्रभावों को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि शराबबंदी से हमेशा अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं होते और इसके कुछ दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं। अदालत ने गुजरात में लंबे समय से लागू शराबबंदी का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रतिबंध के बावजूद जहरीली शराब की घटनाएं सामने आई हैं और कई बार अवैध शराब का कारोबार भूमिगत हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी M/s Balaji Formalin Pvt. Ltd. बनाम भारत संघ मामले में आई। जस्टिस जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई कर रही थी। इन नियमों में मेथनॉल की बिक्री और उसके उपयोग को लेकर लाइसेंस की शर्तों के साथ बिक्री से पहले उसमें विशेष रसायन मिलाने का प्रावधान था।
गुजरात का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान गुजरात में लंबे समय से लागू शराबबंदी का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि शराबबंदी के बावजूद वहां कई जहरीली शराब त्रासदियां सामने आई हैं। फैसले में गुजरात में राज्य गठन के बाद कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब घटनाओं का उल्लेख किया गया, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत होने की बात सामने रखी गई।
अदालत ने अपने अवलोकन में शराबबंदी के व्यापक प्रभावों पर भी विचार किया। कोर्ट के मुताबिक, किसी पदार्थ पर प्रतिबंध लगाने से उसकी मांग समाप्त होना जरूरी नहीं है। ऐसी स्थिति में अवैध आपूर्ति और भूमिगत कारोबार की समस्या सामने आ सकती है।
शराबबंदी से जुड़े संभावित जोखिमों का जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने शराब पर पूर्ण प्रतिबंध के संदर्भ में कई संभावित चुनौतियों का उल्लेख किया। इनमें सरकार के राजस्व में कमी, प्रतिबंध लागू करने में बढ़ने वाला प्रशासनिक खर्च, पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों में भ्रष्टाचार की संभावना, अवैध शराब के निर्माण और तस्करी का विस्तार तथा अन्य नशीले पदार्थों की समस्या बढ़ने का जोखिम शामिल है।
अदालत ने संकेत दिया कि किसी नीति को लागू करते समय उसके घोषित उद्देश्य के साथ-साथ उसके व्यावहारिक परिणामों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
मामला मेथनॉल की बिक्री और इस्तेमाल से जुड़ा था
यह पूरा मामला मेथनॉल के नियमन से जुड़ा था। महाराष्ट्र सरकार ने 2011 में महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स में संशोधन करते हुए मेथनॉल की बिक्री और उपयोग पर अतिरिक्त शर्तें लागू की थीं।
नियम 18A के तहत मेथनॉल बेचने वाले लाइसेंसधारी को खरीदार के लाइसेंस और उसके उपयोग की जानकारी सत्यापित करनी होती थी। दवा निर्माण के अलावा अन्य मामलों में बिक्री से पहले प्रति 100 लीटर मेथनॉल में एक ग्राम मेथिलीन कारमाइन और चार ग्राम डेनाटोनियम सैकराइड मिलाना अनिवार्य किया गया था। नियम 18B में वैध लाइसेंस के बिना रखे गए मेथनॉल को जब्त करने का प्रावधान था।
1991 की मुंबई जहरीली शराब त्रासदी का भी जिक्र
अदालत ने 1991 की मुंबई जहरीली शराब त्रासदी का उल्लेख भी किया। फैसले के अनुसार, अंधेरी इलाके में जहरीली शराब पीने से करीब 93 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद इस तरह की घटनाओं के कारणों और उन्हें रोकने के उपायों पर विचार करने के लिए समिति गठित की गई थी। बाद में मेथनॉल के नियमन से जुड़े कुछ प्रावधान महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स में जोड़े गए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेथनॉल में रंग और कड़वाहट पैदा करने वाले रसायन मिलाने से अवैध शराब में उसके इस्तेमाल को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं मिलती। अदालत के अनुसार अवैध उपयोग रोकने के लिए परिवहन और भंडारण की निगरानी जैसे उपाय अधिक सीधे तरीके से समस्या को संबोधित कर सकते हैं।
नियम 18A और 18B को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बताया
सुप्रीम कोर्ट ने नियम 18A और 18B को संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) की कसौटी पर अनुचित और अनुपातहीन पाया। अदालत ने कहा कि किसी नियम का उद्देश्य जनहित में होना पर्याप्त नहीं है। उसके लिए अपनाया गया तरीका भी घोषित उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़ा और अनुपातिक होना चाहिए।
अदालत के अनुसार मेथनॉल में अनिवार्य रूप से रंग और कड़वाहट पैदा करने वाले पदार्थ मिलाने की शर्त से औद्योगिक उपयोग प्रभावित हो रहा था, जबकि यह साबित नहीं हुआ कि इससे अवैध शराब के निर्माण को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। इसी आधार पर अदालत ने संबंधित प्रावधानों को रद्द कर दिया।
अवैध शराब रोकने के लिए निगरानी पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए लाइसेंसधारकों के सत्यापन, मेथनॉल की खपत की निगरानी, स्टॉक का नियमित मिलान और ऑडिट, बचे हुए मेथनॉल की वापसी तथा उसके परिवहन और भंडारण पर कड़ी निगरानी जैसे उपायों पर जोर दिया। टैंकरों की सुरक्षा और छेड़छाड़ का पता लगाने वाली सील व्यवस्था जैसे उपायों का भी उल्लेख किया गया है।
शराबबंदी की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं
महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला शराबबंदी की संवैधानिक वैधता पर नहीं है। अदालत के सामने मुख्य मुद्दा महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स में मेथनॉल से जुड़े नियम 18A और 18B की वैधता था। इसलिए इस फैसले को देश में शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की अंतिम न्यायिक राय के रूप में नहीं देखा जा सकता।
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