जलसंपदा विभाग ने कुओं, बोरवेल और वर्षा जल संचयन से पानी मिलने का हवाला देकर पुणे की मांग ठुकराई, आंकड़ों पर उठे सवाल।
राहुल गुप्ता
पुणे, 30 अक्टूबर। महाराष्ट्र में पानी की कमी की आशंका के बीच पुणे के जल कोटे को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। जलसंपदा विभाग ने दावा किया है कि पुणे को कुओं, बोरवेल और वर्षा जल संचयन के जरिए करीब 4.85 टीएमसी पानी उपलब्ध होता है। इसी आधार पर विभाग ने पुणे महानगरपालिका की अतिरिक्त पानी की मांग स्वीकार नहीं की। हालांकि, विभाग के इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं कि शहर में वास्तव में इतना भूजल उपलब्ध है या नहीं।
पुणे ने मांगा था 21.34 टीएमसी पानी
महाराष्ट्र जलसंपत्ति नियमन प्राधिकरण के नियमों के अनुसार, पुणे महानगरपालिका हर साल शहर की जरूरत के हिसाब से पानी का अनुमान पेश करती है। वर्ष 2026-27 के लिए महानगरपालिका ने बढ़ती आबादी का हवाला देते हुए 21.34 टीएमसी पानी की मांग की थी। पिछले साल यह मांग 22 टीएमसी थी।
इस बीच खडकवासला, पानशेत, वरसगांव और टेमघर बांधों में पिछले साल की तुलना में कम पानी जमा है। पिछले साल इस समय चारों बांधों में 28.56 टीएमसी यानी करीब 97 प्रतिशत जल भंडारण था। इस साल यह घटकर 24 टीएमसी यानी लगभग 82 प्रतिशत रह गया है।
जलसंपदा विभाग ने कितना कोटा मंजूर किया?
जलसंपदा विभाग ने महानगरपालिका के प्रस्ताव के आधार पर 14.27 टीएमसी सीधे पानी का कोटा और 1.91 टीएमसी पानी की बर्बादी को ध्यान में रखते हुए कुल 16.11 टीएमसी का कोटा मंजूर किया। लेकिन विभाग ने कुओं, बोरवेल और वर्षा जल संचयन से 4.85 टीएमसी पानी उपलब्ध होने का दावा करते हुए महानगरपालिका की अतिरिक्त मांग खारिज कर दी।
इस गणना के बाद पुणे को बांधों से वास्तव में करीब 11.33 टीएमसी पानी मिलने की स्थिति बन रही थी। हालांकि, उपमुख्यमंत्री और पालकमंत्री सुनेत्रा पवार की अध्यक्षता में तथा जलसंपदा मंत्री राधाकृष्ण विखे-पाटील की मौजूदगी में हुई कालवा सलाहकार समिति की बैठक में पुणे के लिए अगस्त के अंत तक 13 टीएमसी पानी उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। इससे शहर को राहत मिली।
भूजल के आंकड़ों पर क्यों उठ रहे सवाल?
जलसंपदा विभाग के भूजल संबंधी दावे पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि पुणे में कई पुराने वाड़ों के साथ उनकी कुएं भी खत्म हो चुके हैं। वहीं, उजवा मुठा नहर के आसपास कई कुएं नहर से रिसने वाले पानी के कारण सालभर भरे रहते हैं। इन कुओं से टैंकरों के जरिए पानी की आपूर्ति किए जाने की बात भी सामने आती रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इन कुओं से निकाले जाने वाले पानी का हिसाब कौन रखता है।
वर्षा जल संचयन के दावे पर भी सवाल हैं। पुणे में इस सुविधा को अपनाने वाले 30,813 संपत्ति धारक हैं। महानगरपालिका की ओर से वर्षा जल संचयन, सौर ऊर्जा और वर्मी कंपोस्ट जैसे उपक्रमों पर संपत्ति कर में छूट दी जाती है। इसके बावजूद विभाग का दावा है कि वर्षा जल संचयन से शहर को पर्याप्त पानी मिलता है।
300 बोरवेल के सर्वे में सामने आई थी स्थिति
पुणे में भूजल की स्थिति जानने के लिए दिल्ली की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स की मदद से कुछ क्षेत्रों में प्रायोगिक परियोजना चलाई गई थी। इसके तहत शहर की 300 बोरवेल का सर्वेक्षण किया गया।
इस सर्वे में बाणेर और पाषाण की 72, औंध की 62, कर्वेनगर और कोथरुड की 82, मध्य पुणे के पेठ और शिवाजीनगर क्षेत्र की 70 तथा सोलापुर रोड की 34 बोरवेल शामिल थीं। सर्वेक्षण में भूजल की स्थिति संतोषजनक नहीं पाई गई थी।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब सर्वे में भूजल की स्थिति अच्छी नहीं मिली, तो जलसंपदा विभाग ने किस आधार पर पुणे में 4.85 टीएमसी पानी उपलब्ध होने का अनुमान लगाया है। विभाग के इस दावे और पानी के वास्तविक इस्तेमाल के आंकड़ों को लेकर अब बहस तेज हो सकती है।
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