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स्वदेशी महोत्सव 2025 में हरियाणवी पगड़ी बनी माननीयों और पर्यटकों की पहली पसंद

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डॉ.महासिंह पूनिया ने 2015 में की थी पगड़ी बंधाओ फोटो खिंचाओ की शुरूआत

 

पंचकूला, 22 दिसम्बर। स्वदेशी जागरण मंच की ओर से पंचकूला के सैक्टर 5 परेड ग्राऊंड में चल रहे स्वदेशी महोत्सव में विरासत दि हेरिटेज विलेज कुरुक्षेत्र द्वारा लगाई गई सांस्कृतिक प्रदर्शनी में हरियाणवी पगड़ी का क्रेज पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। विरासत की ओर से लगाए गए स्टॉल में अब तक सैंकडों लोगों ने पगड़ी बंधवाकर स्वदेशी का परिचय दिया है। 

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यह जानकारी मेला के संयोजक एवं उत्तर क्षेत्र के स्वदेशी मंच के प्रभारी राजेश गोयल ने दी। उन्होंने कहा कि हरियाणा की सांस्कृतिक प्रदर्शनी सभी के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। यहां पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, हरियाणा भाजपा के प्रभारी सतीश पूनिया, संपूर्णानंद महाराज, राज्यसभा सदस्य रेखा शर्मा, कालका की विधायक शक्ति रानी शर्मा, पंचकूला के मेयर कुलभूषण गोयल , स्वदेशी के राष्ट्रीय सह-संगठक सतीश , विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता, फिल्मी अभिनेता आबिद आलीवाल सहित अनेक लोगो ने पगड़ी बंधवाकर जहां एक ओर स्वदेशी का परिचय दिया है, वहीं पर संस्कृति के प्रति अपने लगाव की अभिव्यक्ति की है। 

पगड़ी के विषय में विस्तार से जानकारी देते हुए विरासत दि हेरिटेज विलेज सांस्कृतिक प्रदर्शनी के प्रभारी डॉ. महासिंह पूनिया ने बताया कि लोकजीवन में पग, पाग, पग्गड़, पगड़ी, पगमंडासा, साफा, पेचा, फेंटा, खण्डवा, खण्डका, आदि नामों से जाना जाता है। जबकि साहित्य में पगड़ी को रूमालियो, परणा, शीशकाय, जालक, मुरैठा, मुकुट, कनटोपा, मदील, मोलिया और चिंदी आदि नामों से जाना जाता है।

वास्तव में पगड़ी का मूल ध्येय शरीर के ऊपरी भाग (सिर) को सर्दी, गर्मी, धूप, लू, वर्षा आदि विपदाओं से सुरक्षित रखना रहा है, किंतु धीरे-धीरे इसे सामाजिक मान्यता के माध्यम से मान और सम्मान के प्रतीक के साथ जोड़ दिया गया, क्योंकि पगड़ी सिरोधार्य है। यदि पगड़ी के अतीत के इतिहास में झांक कर देखें, तो अनादिकाल से ही पगड़ी को धारण करने की परम्परा रही है।

उन्होंने बताया कि लोकजीवन में पगड़ी की विशेष महत्ता है। पगड़ी की परम्परा का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। पगड़ी जहां एक ओर लोक सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़ी हुई है, वहीं पर सामाजिक सरोकारों से भी इसका गहरा नाता है। हरियाणा के खादर, बांगर, बागड़, अहीरवाल, बृज, मेवात, कौरवी क्षेत्र सभी क्षेत्रों में पगड़ी की विविधता देखने को मिलती है।

प्राचीन काल में सिर को सुरक्षित ढंग से रखने के लिए पगड़ी का प्रयोग किया जाने लगा। पगड़ी को सिर पर धारण किया जाता है। इसलिए इस परिधान को सभी परिधानों में सर्वोच्च स्थान मिला।

 

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