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वर्षों बाद अपने गांव की ओर, जहां घर नहीं, मेरी स्मृतियां रहती थीं !

एनडी

देवभूमि। आज कई वर्षों बाद दूर हिमालय की गोद में बसे अपने गाँव लौटने का अवसर मिला। पहाड़ों की ऊँची चोटियाँ बर्फ की सफेद चादर ओढ़े खड़ी थीं। चारों ओर धवल शांति पसरी हुई थी। देवदार और चीड़ के वृक्षों के बीच से आती ठंडी हवा चेहरे को छू रही थी, लेकिन उस हवा में आज बचपन की वह परिचित गर्माहट नहीं थी।

मैं जिस गाँव को अपनी स्मृतियों में लेकर वर्षों से जी रहा था, वह गाँव आज मेरे सामने था—लेकिन बदला हुआ, बहुत बदला हुआ।

कभी यह गाँव जीवन से भरा रहता था। घरों से धुआँ उठता था, आँगनों में बच्चे खेलते थे, बुजुर्ग चौपालों में बैठकर बातें करते थे और दूर से आती किसी परिचित आवाज पर लोग अपने घरों से बाहर निकल आते थे। किसी के घर शादी होती तो पूरा गाँव अपना घर समझकर उसमें शामिल हो जाता था। किसी के यहाँ दुःख आता तो पूरा गाँव उसके साथ खड़ा दिखाई देता था।

आज वही गाँव जैसे अपने ही अतीत की राख पर बैठा हुआ है।
पगडंडियाँ वही हैं, पहाड़ वही हैं, आकाश वही है, हवा भी शायद वही है—लेकिन उन रास्तों पर चलने वाले लोग नहीं हैं। जिन घरों की खिड़कियों से कभी रोशनी दिखाई देती थी, उनमें से अधिकांश बंद हैं। कई घरों की छतें ढह चुकी हैं। कई आँगनों में घास उग आई है। कुछ दरवाजे ऐसे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि उन्हें आखिरी बार किसी ने वर्षों पहले खोला होगा।

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और फिर मैं उस जगह पहुँचा जहाँ कभी मेरा घर हुआ करता था।
पत्थर की स्लेटों से बना वह घर…
जिसके साथ मेरा बचपन जुड़ा था। जिसकी दीवारों को मैंने केवल पत्थर और मिट्टी की दीवारें नहीं समझा था, बल्कि उनमें अपने परिवार की साँसें महसूस की थीं। जहाँ मौसम बदलने का अर्थ केवल मौसम बदलना नहीं था—बल्कि घर के भीतर जीवन का एक नया रंग आ जाना था।

आज उस घर का अधिकांश हिस्सा टूट चुका है।
कुछ पत्थर अब भी बिखरे पड़े हैं। कहीं टूटी हुई स्लेटें हैं, कहीं ढह चुकी दीवारों के अवशेष। जिस आँगन में कभी जीवन था, वहाँ अब सन्नाटा है।

मैं काफी देर तक वहीं खड़ा रहा।
मेरी आँखें उस खंडहर को देख रही थीं, लेकिन मन उस घर को खोज रहा था जो अब वहाँ था ही नहीं।

मुझे लगा जैसे मैं किसी मकान के खंडहर के सामने नहीं, बल्कि अपने ही अतीत के सामने खड़ा हूँ।

याद आया—यहीं कभी घर के बड़े-बुजुर्ग बैठते थे। यहीं बच्चे खेलते थे। यहीं त्योहारों की तैयारी होती थी। यहीं रिश्तेदार आते थे। यहीं किसी के आने की आहट पूरे घर में उत्साह भर देती थी।
आज वही जगह मेरे सामने चुप थी।
इतनी चुप कि मुझे अपने भीतर की आवाज भी साफ सुनाई देने लगी।

समय कितना निर्मम होता है!
वह किसी से पूछकर नहीं बदलता। वह न रिश्तों की परवाह करता है, न घरों की, न स्मृतियों की। वह बस चलता रहता है। और जब हम वर्षों बाद पीछे मुड़कर देखते हैं तो पता चलता है कि जिस दुनिया को हमने अपनी स्मृतियों में सुरक्षित रखा था, वह वास्तविक दुनिया में कब की बदल चुकी है।

मेरे गाँव में अब आसपास रहने वाला लगभग कोई नहीं है।
बस दो विधवा चाचियाँ हैं—अपने-अपने दुःख और अकेलेपन को समेटे हुए। उनकी आँखों में भी शायद इस गाँव की पूरी कहानी दर्ज है। उन्होंने लोगों को आते देखा, घरों को बसते देखा, बच्चों को जवान होते देखा और फिर उन्हीं बच्चों को रोज़गार और बेहतर जीवन की तलाश में पहाड़ छोड़कर शहरों की ओर जाते देखा।
अब उनके पास स्मृतियाँ हैं और उन स्मृतियों के साथ एक लंबी प्रतीक्षा।

गाँव में एक योगी भी रहता है।
हर सुबह वह उठता है और यज्ञ करता है।
जब पूरा गाँव अभी नींद में डूबा होता है, तब उसके यज्ञ की अग्नि जल उठती है। मंत्रों की ध्वनि उस वीरान पहाड़ी वातावरण में फैलती है। धुएँ की पतली-सी लकीर आकाश की ओर उठती है।

मुझे लगा, शायद वह केवल यज्ञ की अग्नि नहीं जला रहा।
शायद वह इस गाँव के बुझते हुए जीवन में अस्तित्व की आखिरी लौ जलाए हुए है।
उसकी मंत्रध्वनि में मुझे एक अजीब-सी करुणा सुनाई दी। जैसे वह देवताओं से केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गाँव के लिए प्रार्थना कर रहा हो—उन घरों के लिए जो खाली हो गए हैं, उन लोगों के लिए जो दूर चले गए हैं और उन स्मृतियों के लिए जो धीरे-धीरे धुँधली होती जा रही हैं।

पहाड़ों में बसे गाँवों का सबसे बड़ा दुःख केवल पलायन नहीं है।
दुःख यह है कि उनके साथ एक पूरा संसार चला जाता है।

लोग शहरों में जाकर घर बना लेते हैं, लेकिन उनके पीछे गाँव में छूट जाता है—एक पुराना मकान, एक सूना आँगन, कुछ बंद दरवाजे, कुछ बूढ़ी आँखें और बहुत सारी स्मृतियाँ।

शहरों में हम सुविधाएँ तलाशते हैं और पहाड़ों में हमारी स्मृतियाँ हमारा इंतजार करती रहती हैं।

आज मुझे महसूस हुआ कि मनुष्य चाहे जितनी दूर चला जाए, उसकी जड़ें वहीं रहती हैं जहाँ उसने पहली बार मिट्टी को छुआ था, जहाँ पहली बार किसी ने उसका नाम पुकारा था, जहाँ उसने पहली बार आकाश को देखा था।

शायद इसी को अपनी मिट्टी कहते हैं।
मैं अपने टूटे हुए घर की कुछ देर तक तस्वीरें लेता रहा। लेकिन अचानक लगा कि कैमरा उस घर को कैद नहीं कर सकता जिसे मैं तलाश रहा हूँ।
क्योंकि वह घर अब पत्थरों में नहीं था।
वह मेरे भीतर था।
मेरी स्मृतियों में था।
मेरे बचपन की आवाजों में था।
उन चेहरों में था जो अब इस दुनिया में नहीं हैं।

उस घर की दीवारें भले टूट गईं, लेकिन उसकी छत के नीचे बिताया हुआ मेरा बचपन आज भी मेरे भीतर सुरक्षित है।

बर्फ अब भी पहाड़ों पर गिरती है। हवाएँ अब भी उन्हीं रास्तों से गुजरती हैं। सूरज अब भी उन्हीं चोटियों के पीछे से निकलता है। लेकिन मनुष्य बदल गया है और उसके साथ गाँव भी बदल गया है।
मैंने आखिरी बार पीछे मुड़कर अपने उस पुराने घर को देखा।
मन ने कहा—तुम देर से लौटे।
शायद सचमुच मैं देर से लौटा था।
बहुत देर से।
काश, कभी पहले लौट आया होता।
काश, उन दीवारों को टूटने से पहले देख पाता। काश, उन आँगनों में फिर कुछ देर बैठ पाता। काश, उन लोगों से फिर मिल पाता जिनकी आवाजें अब केवल स्मृतियों में सुनाई देती हैं।

लेकिन जीवन में सबसे कठिन शब्द शायद यही है—काश।
यह शब्द हमारे पास तब आता है जब समय हमारे हाथों से निकल चुका होता है।

मैं जब गाँव से वापस लौटने लगा तो पीछे पहाड़ों पर सफेद बर्फ चमक रही थी। मेरा गाँव धीरे-धीरे मेरी आँखों से ओझल हो रहा था।
लेकिन इस बार मैं अपने साथ कुछ लेकर लौट रहा था।
कोई वस्तु नहीं।
कोई पत्थर नहीं।
बस अपने बचपन की कुछ धुँधली तस्वीरें, कुछ पुरानी आवाजें, कुछ रिश्तों की गर्माहट और अपने टूटे हुए घर की वह खामोश पुकार।
आज समझ आया कि घर ईंट-पत्थरों से नहीं बनता। घर उन लोगों से बनता है जो उसमें रहते हैं।

लोग चले जाएँ तो सबसे मजबूत मकान भी धीरे-धीरे खंडहर बन जाता है।
और कभी-कभी एक टूटा हुआ घर भी इंसान के भीतर पूरी उम्र जीवित रहता है।

मेरा गाँव आज भले ही बदल चुका है।
मेरा घर भले ही टूट चुका है।
आसपास रहने वाले लोग भले ही चले गए हैं।
लेकिन मेरे भीतर वह गाँव आज भी वैसा ही है—
बर्फ से ढके हिमालय की गोद में बसा हुआ…
पत्थर की स्लेटों से बने उस छोटे-से घर के साथ…
जहाँ मेरा बचपन अब भी शायद मेरा इंतजार कर रहा है।

पढ़ने के लिए धन्यवाद

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