मोहाली, 18 नवम्बर – 10 अक्टूबर से 14 नवंबर के बीच केवल एक महीने में मनरेगा डाटाबेस से लगभग 27 लाख मजदूरों के नाम काटे जाने की खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिद्धू ने इसे बेहद चिंताजनक बताया और कहा कि यह गरीब मजदूर वर्ग के साथ सीधी नाइंसाफी है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की यह कार्रवाई गंभीर प्रशासनिक नाकामी और मजदूर-विरोधी फैसला है।
बलबीर सिद्धू ने आरोप लगाया कि केंद्र ने ई-केवाईसी का बहाना बनाकर करोड़ों गरीब कामगारों को उनके कानूनी अधिकार से वंचित करने की साजिश रची है। लिबटेक की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जहां पिछले छह महीनों में सिर्फ 15 लाख वर्कर हटाए गए थे, वहीं एक महीने में 27 लाख नाम काटे जाना साफ दिखाता है कि यह कोई “सामान्य सत्यापन प्रक्रिया” नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया बड़े स्तर पर डाटाबेस सफाया है।
उन्होंने ध्यान दिलाया कि जिन राज्यों—जैसे आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़—जहां ई-केवाईसी का रिकार्ड सबसे बेहतर है, वहीं पर सबसे ज्यादा नाम काटे गए हैं। यह बात केंद्र की प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं, बल्कि संदिग्ध और पक्षपाती बनाती है।
सिद्धू ने कहा कि मजदूर पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे हैं, ऐसे में यह उनके लिए बड़ा नुकसान है। मनरेगा में काम करना उनकी रोज़ी-रोटी का प्रमुख साधन था।
सिद्धू ने मांग की कि केंद्र सरकार तुरंत सभी कटे हुए जॉब कार्डों की स्वतंत्र जांच करवाए, गलत तरीके से हटाए गए नामों को तुरंत बहाल करे और ई-केवाईसी के नाम पर चलाई जा रही इस बेरहम कार्रवाई को रोके। उन्होंने कहा कि मनरेगा कामगार देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ हैं और उनके अधिकारों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
बलबीर सिद्धू ने कहा कि यह कटौती सीधे-सीधे ग्रामीण परिवारों की आजीविका पर वार है। मनरेगा की 200–300 रुपये दिहाड़ी उनके लिए जीवन-यापन का मुख्य स्रोत है। इसलिए यह कदम सिर्फ डाटा मिटाना नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की जिंदगी से खिलवाड़ है।
उन्होंने केंद्र की इस दलील को खारिज किया कि “यह नियमित सत्यापन प्रक्रिया का हिस्सा है।” उन्होंने पूछा कि अगर यह सामान्य प्रक्रिया थी, तो फिर एक ही महीने में 27 लाख कामगार कैसे गायब हो सकते हैं? इससे साफ पता चलता है कि भाजपा-नीत केंद्र सरकार मनरेगा के बजट और अधिकारों को धीरे-धीरे कम करने की योजना पर काम कर रही है।
सिद्धू ने कहा कि मजदूरों के नाम काटना सिर्फ एक योजना को कम करना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की आर्थिक रीढ़ को तोड़ना है। जहां मजदूर अपनी घरेलू आय को मजबूत करने के लिए मनरेगा पर निर्भर हैं, वहीं सरकार की यह कार्रवाई गरीबों, दलितों, महिलाओं और बेरोज़गार युवाओं के हितों पर खुला हमला है।
उन्होंने दोहराया कि मनरेगा कोई दान नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार है। इस अधिकार को डिजिटल खामियों या सत्यापन की गलतियों के नाम पर खत्म करना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। केंद्र सरकार को चाहिए था कि मजदूरों के लिए मुश्किल डिजिटल प्रक्रियाएं बनाने की बजाय सरल और मानव-केन्द्रित व्यवस्था तैयार करे।