लेखिका : वैशाली तोमर
प्रदेश प्रवक्ता, हरियाणा भाजपा
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 21वीं सदी का तीसरा दशक एक युगांतकारी परिवर्तन का गवाह बना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ केवल एक संवैधानिक संशोधन नहीं, बल्कि भारत की ‘आधी आबादी’ के सामर्थ्य पर राष्ट्र के अटूट विश्वास का उद्घोष है। यह अधिनियम उस राजनीतिक इच्छाशक्ति का जीवंत प्रमाण है, जिसने दशकों की जड़ता को तोड़कर महिलाओं को नीति-निर्धारण के केंद्र में लाने का साहस दिखाया है। महिला आरक्षण का मुद्दा भारतीय राजनीति में लगभग 27 वर्षों तक अनिश्चितता के भंवर में फंसा रहा। कई सरकारें आईं और गईं, चर्चाएं हुईं, लेकिन अंततः राजनीतिक लाभ-हानि के समीकरणों ने इसे ठंडे बस्ते में ही रखा। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘अमृत काल’ के संकल्पों के साथ इस विषय को प्राथमिकता दी। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि “महिला नेतृत्व वाला विकास” ही विकसित भारत का एकमात्र मार्ग है। नए संसद भवन के ‘श्रीगणेश’ सत्र में इस विधेयक का पारित होना यह दर्शाता है कि सरकार की कथनी और करनी में रत्ती भर भी भेद नहीं है। यह अधिनियम कोई एकाकी प्रयास नहीं है, बल्कि यह एक सुविचारित सामाजिक क्रांति की अगली कड़ी है।
पिछले एक दशक का सफर देखें तो सरकार ने महिलाओं के जीवन चक्र के हर पड़ाव पर ध्यान दिया है। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ ने लिंगानुपात सुधारा और बेटियों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण बदला। स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने करोड़ों शौचालयों और उज्ज्वला योजना के गैस कनेक्शनों ने महिलाओं को शारीरिक कष्ट और अपमान से मुक्ति दिलाई। मुद्रा योजना और जन-धन खातों के जरिए करोड़ों महिला उद्यमियों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ा गया। तीन तलाक जैसी कुरीतियों का अंत कर मुस्लिम महिलाओं को सुरक्षा और आत्मसम्मान का अधिकार दिया गया।
अब, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ इसी यात्रा का सर्वोच्च पड़ाव है, जहाँ महिलाएँ केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि स्वयं ‘भाग्य विधाता’ और ‘कानून निर्माता’ की भूमिका में होंगी। सरकार की मंशा इस अधिनियम को केवल कागजों तक सीमित रखने की नहीं है। प्रधानमंत्री की सोच स्पष्ट है कि इसका वास्तविक लाभ 2029 के लोकसभा चुनाव से ही देश को मिलना शुरू हो जाए। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आगामी संसदीय सत्रों में इसके कार्यान्वयन की रूपरेखा, जनगणना और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण चरणों पर गहन मंथन प्रस्तावित है। यह सरकार की कार्यकुशलता ही है कि वह पेचीदा प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा कर महिलाओं के राजनीतिक अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रसर है।
संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण न केवल संख्यात्मक बदलाव लाएगा, बल्कि इसके गुणात्मक परिणाम भी होंगे। महिलाओं की भागीदारी से शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अधिक संवेदनशीलता के साथ कानून बनेंगे। पंचायत स्तर पर सफल नेतृत्व कर रही लाखों महिलाएँ अब राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर सकेंगी। राजनीति में महिलाओं के बढ़ते कदम से राजनीतिक संस्कृति में शुचिता और गरिमा आने की प्रबल संभावना है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ वास्तव में राष्ट्रहित की उस सोच का प्रतिबिंब है, जहाँ विकास का लाभ अंतिम छोर पर खड़ी महिला तक पहुँचने की बात की गई है। यह प्रधानमंत्री मोदी के उस दृष्टिकोण की सिद्धि है, जिसमें वे कहते हैं कि “जब नारी का सशक्तिकरण होता है, तो समाज का सशक्तिकरण होता है और जब समाज सशक्त होता है, तो राष्ट्र समर्थ बनता है।”
2029 का चुनाव भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय लिखेगा, जब हमारी माताएं, बहनें और बेटियाँ संसद के गलियारों में बैठकर भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाने की दिशा में निर्णय लेंगी। यह अधिनियम नए भारत की उस उड़ान का प्रतीक है, जिसकी गति अजेय है और जिसका लक्ष्य ‘परम वैभव’ है।
“नारी तुम केवल श्रद्धा हो नहीं, अब तुम राष्ट्र की शक्ति और कानून की शक्ति भी हो।”