नवरात्रि के दौरान आयोजित मशाल महोत्सव में ढोल-ताशों, पारंपरिक पूजा और जय भवानी-जय शिवाजी के नारों से गूंज उठा पूरा किला।
राहुल गुप्ता
सतारा, 17 अक्टूबर। छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य और मराठा इतिहास की गवाही देने वाले ऐतिहासिक प्रतापगढ़ किले पर नवरात्रि के अवसर पर भव्य मशाल महोत्सव आयोजित किया गया। प्रतापगढ़वासिनी श्री भवानी माता मंदिर के 367 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में शुक्रवार रात 367 मशालें प्रज्वलित की गईं। इस नजारे को देखने और भवानी माता के दर्शन के लिए राज्यभर से हजारों श्रद्धालु और शिवभक्त किले पर पहुंचे।
जय भवानी, जय शिवाजी के नारों से गूंजा किला
अश्विन शुक्ल षष्ठी के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में रात को भवानी माता की विधिवत पूजा और पारंपरिक गोंधल अनुष्ठान किया गया। इसके बाद ढोल-ताशों, तुतारी और शहनाई की धुन के बीच ‘जय भवानी, जय शिवाजी’ और ‘छत्रपति शिवाजी महाराज की जय’ के जयघोष से पूरा परिसर गूंज उठा।
सांसद उदयनराजे भोसले, कल्पनाराजे भोसले और दमयंतीराजे भोसले के मार्गदर्शन में आयोजित इस समारोह में रक्षक प्रतिष्ठान के संस्थापक अध्यक्ष सुशील दादा मोझर ने मशाल प्रज्वलित की। नवरात्रि के अवसर पर किले में कई धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
भवानी माता मंदिर से किले के बुर्ज तक मशालें अनुशासित तरीके से प्रज्वलित की गईं। स्वराज्य ढोल-ताशा और लेझीम दल की प्रस्तुतियों के साथ भगवा झंडों ने माहौल को उत्साहपूर्ण बना दिया। आतिशबाजी और रोशनी के बीच मशालों की पीली-नारंगी चमक से पूरा किला जगमगा उठा। इस दृश्य को कैमरों और मोबाइल फोन में कैद करने के लिए युवाओं और छायाकारों की भीड़ लगी रही।
कार्यक्रम के बाद स्थानीय ग्रामीणों की ओर से श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद की व्यवस्था की गई।
15 से 20 दिन पहले शुरू होती है तैयारी
मशाल महोत्सव की तैयारियां करीब 15 से 20 दिन पहले शुरू हो जाती हैं। आयोजकों ने इसके लिए 367 विशेष स्टेनलेस स्टील की मशालें तैयार कराई हैं। प्रत्येक मशाल को जलाने के लिए लगभग 250 सूती साड़ियों का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी दी गई है। इन साड़ियों को करीब 15 दिन पहले लगभग 150 किलोग्राम तेल में भिगोकर रखा जाता है, ताकि मशालें आसानी से जल सकें और लंबे समय तक प्रज्वलित रहें।
प्रतापगढ़ की नवरात्रि परंपरा भी खास
प्रतापगढ़ किले पर नवरात्रि उत्सव की अपनी विशिष्ट परंपरा है। यहां मंदिर में दो मुख्य घट स्थापित किए जाते हैं। इनमें से एक छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर और दूसरा छत्रपति राजाराम महाराज के नाम पर स्थापित किया जाता है। यह परंपरा स्वराज्य के इतिहास और उसकी विरासत से जुड़ी मानी जाती है।
इस भव्य आयोजन में हस्तकला केंद्र, स्वराज्य ढोल पथक, माय भवानी सामाजिक संस्था, स्वस्तिक ग्रुप, शिवमुद्रांकन प्रतिष्ठान (पोलादपुर) तथा प्रतापगढ़ और वाडा कुंभरोशी के ग्रामीणों ने संयुक्त रूप से भाग लिया। मंदिर की 367वीं वर्षगांठ पर आयोजित यह मशाल महोत्सव श्रद्धालुओं और शिवभक्तों के लिए यादगार बन गया।
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