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कालिदास ऑडिटोरियम में संतूर और स्वर के अलौकिक संगम में डूबते चले गए शास्त्रीय संगीत प्रेमी

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पटियाला : नॉर्थ ज़ोन कल्चरल सेंटर, पटियाला द्वारा आयोजित पटियाला संगीत समारोह के समापन दिवस पर कालिदास ऑडिटोरियम में एक ऐसी यादगार संगीत संध्या सजी, जिसने पूरे आयोजन को गरिमा और सौंदर्य के साथ पूर्णता प्रदान की। अंतिम दिन मंच साझा किया विश्वविख्यात संतूर वादक पं. अभय रुस्तम सोपोरी और बनारस घराने के कश्यप बंधुओं—पं. प्रभाकर कश्यप एवं पं. दिवाकर कश्यप ने। उनकी संयुक्त प्रस्तुति समारोह का केंद्रीय आकर्षण बनी और श्रोताओं ने इसे भाव-विभोर होकर सराहा। तबले पर पं. संजू सहाय और पखावज पर ऋषि शंकर उपाध्याय की सशक्त संगत ने पूरी प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। 

 

 
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कश्मीर की सोपोरी–सूफ़ियाना घराना परंपरा के वर्तमान ध्वजवाहक पं. अभय रुस्तम सोपोरी ने संतूर की कोमल, पारदर्शी और आध्यात्मिक झंकार से आरंभ से ही वातावरण को आध्यात्मिक शांति से भर दिया। उनके आलाप और स्वर-संयोजन में कश्मीर की सांगीतिक विरासत की जीवंत अनुभूति होती रही। शास्त्रीय संगीत प्रेमी उनकी विद्वतापूर्ण और भावपूर्ण प्रस्तुति में सहज ही डूबते चले गए।
 
पं. अभय सोपोरी भारत की प्राचीन संतूर परंपरा और सोपोरी–सूफ़ियाना घराने के वर्तमान ख़लीफ़ा हैं। उन्हें गुरु–शिष्य परंपरा के अंतर्गत अपने दादा स्वर्गीय पं. शंभू नाथ सोपोरी और पिता स्वर्गीय पं. भजन सोपोरी से संगीत की दीक्षा मिली—जिन्हें क्रमशः जम्मू–कश्मीर में ‘संगीत के जनक’ और ‘संतूर के संत’ के रूप में जाना जाता है।
 
इस अवसर पर उन्होंने स्वयं रचित राग भगवती की प्रस्तुति दी। विस्तृत आलाप और जोड़ के पश्चात विलंबित झपताल में गत, मध्यलय एकताल में “हे मां तू है भवानी, कृपा करो हे भगवती” बंदिश तथा द्रुत तीनताल में सोपोरी गत प्रस्तुत की। उनके वादन में राग की शुद्धता, लय की स्पष्टता और भावों की गहन अभिव्यक्ति विशेष रूप से दृष्टिगोचर हुई।
 
उनकी प्रस्तुति की विशिष्टता ‘सोपोरी बाज’ रही, जिसमें गायकी और तंत्रकारी अंगों का संतुलित और सशक्त समन्वय देखने को मिला। ‘गायन–वादन बाज’ और ‘बीन अंग’ के जटिल छंद और लय संयोजन ने प्रस्तुति को विशिष्ट ऊँचाई दी। पखावज संगत के साथ प्रस्तुत ध्रुपद अंग ने शैव–सूफी परंपरा की आध्यात्मिक चेतना को पुनर्जीवित कर दिया।
 
 

वहीं बनारस घराने की मधुर और भावगर्भी गायकी के प्रतिनिधि कश्यप बंधुओं ने अपनी सुरभरी आवाज़ से संतूर की झंकार को सुंदर संवाद प्रदान किया। खयाल बंदिशों की नज़ाकत, बनारस की विशिष्ट लयकारी और स्वर की कोमलता ने संतूर के साथ ऐसा स्वाभाविक संतुलन रचा कि प्रस्तुति एक संयुक्त संगीत-यात्रा में परिवर्तित हो गई। विशेष रूप से ठुमरी और दादरा की प्रस्तुति ने श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया।
 
संतूर और स्वर के इस दुर्लभ संगम ने समारोह के अंतिम दिन को एक अविस्मरणीय संगीत-क्षण में बदल दिया, जहाँ परंपरा, साधना, तकनीक और भाव एक साथ साकार होते नज़र आए। प्रस्तुति की समाप्ति पर कालिदास ऑडिटोरियम देर तक तालियों से गूंजता रहा, जो कलाकारों के प्रति दर्शकों के सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का सशक्त प्रमाण था। 
 
इस गरिमामयी संयुक्त प्रस्तुति के साथ पटियाला संगीत समारोह का समापन पुष्प वर्षा से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से हुआ। दर्शक एनज़ेडसीसी के निदेशक फ़ुरक़ान ख़ान के नेतृत्व में सृजित इस मधुर सांगीतिक स्मृति को अपने हृदय में संजोए हुए है।
 

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