कहीं 650 फीट गहरे बोरवेल, तो कहीं छह दिन में एक बार नल से पानी; सरकारी व्यवस्था की नाकामी के बीच निजी जल कारोबार लगातार फैल रहा है।
राहुल गुप्ता
छत्रपति संभाजीनगर, 16 अक्टूबर। मराठवाड़ा में पानी की कमी अब सिर्फ सूखे और घटते जलस्तर की समस्या नहीं रह गई है। कई इलाकों में लोगों को पांच से छह दिन के अंतराल पर नल से पानी मिलता है। पानी जमा करने के लिए टंकियां और ड्रम खरीदने पड़ते हैं, जबकि कुछ इलाकों में रात डेढ़ बजे भी जलापूर्ति की जाती है। सार्वजनिक व्यवस्था से पर्याप्त पानी नहीं मिलने के कारण निजी जल कारोबार का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
65 फीट से 650 फीट तक पहुंची बोरवेल की गहराई
महाराष्ट्र में 1972 में भूजल सर्वेक्षण विभाग की स्थापना के समय राज्य सूखे का सामना कर रहा था। उस दौर में मराठवाड़ा में भूजल की स्थिति आज की तुलना में बेहतर थी। शुरुआती वर्षों में बच्चों को स्कूलों में पीने का पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बोरवेल खोदने की पहल की गई थी। इसके लिए यूनिसेफ ने विभाग को छह रिग मशीनें भी उपलब्ध कराई थीं।
बताया जाता है कि मराठवाड़ा का पहला बोरवेल लातूर जिले के याकतपुर गांव में खोदा गया था। उस समय भूजल स्तर करीब 65 फीट तक था और एक बोरवेल खोदने में लगभग तीन दिन लगते थे। अब बोरवेल की गहराई 650 फीट तक पहुंच गई है, जबकि आधुनिक मशीनों से कुछ ही घंटों में खुदाई पूरी हो जाती है।
खेती में गन्ने का विस्तार और भूजल पर बढ़ता दबाव
1980 के दशक में जालना और लातूर जैसे जिले बोरवेल के इस्तेमाल में आगे थे। बाद में सिंचाई के लिए भी बोरवेल खोदे जाने लगे और धीरे-धीरे यह चलन तेजी से बढ़ा। स्थिति यह है कि कुछ किसान एक एकड़ जमीन में दो या उससे अधिक बोरवेल तक खोद रहे हैं।
इसके बावजूद पीने के पानी की समस्या बनी हुई है। मराठवाड़ा के 929 जल परियोजनाओं में पिछले वर्ष की तुलना में 35 प्रतिशत कम जल भंडारण होने का उल्लेख किया गया है। क्षेत्र में सूखा, ओलावृष्टि और अतिवृष्टि जैसी स्थितियों के बावजूद जल प्रबंधन और फसलों के चयन पर सवाल उठ रहे हैं।
अधिकारी सुनील केंद्रकर की एक रिपोर्ट में मराठवाड़ा से चीनी मिलों को हटाने का सुझाव दिए जाने का भी उल्लेख किया गया था। यह सुझाव क्षेत्र में गन्ने की खेती और पानी की खपत को लेकर बहस का विषय बना, लेकिन इस पर व्यापक बदलाव नहीं हो सका।
पानी की कमी ने खड़ा किया निजी कारोबार
छत्रपति संभाजीनगर में जवाहरनगर पुलिस थाने के सामने बोरवेल की मरम्मत और खुदाई से जुड़ी करीब 20 दुकानें होने का उल्लेख किया गया है। यहां बोरवेल की मरम्मत से लेकर नई खुदाई की बुकिंग तक की सुविधा मिलती है। आंध्र प्रदेश के विभिन्न इलाकों से भी बोरवेल खोदने वाली मशीनें मराठवाड़ा पहुंचती हैं। एक बोरवेल तैयार कराने पर लगभग 70,000 से 75,000 रुपये खर्च होने की बात कही गई है।
दूसरी ओर, पीने के पानी की कमी ने पानी शुद्ध करने वाले केंद्रों का कारोबार भी बढ़ाया है। एक केंद्र स्थापित करने में करीब 6 से 8 लाख रुपये का निवेश होता है। ऐसे केंद्रों से रोजाना सैकड़ों पानी के जार बेचे जाते हैं। यदि एक केंद्र रोज 500 जार तक बेचता है और प्रत्येक जार की कीमत 30 रुपये है, तो दैनिक बिक्री 15,000 रुपये तक पहुंच सकती है।
इसी हिसाब से 30 दिन में एक केंद्र की बिक्री 4.5 लाख रुपये तक हो सकती है। यदि किसी शहर में ऐसे 150 केंद्र हों, तो कुल मासिक बिक्री करीब 6.75 करोड़ रुपये बन सकती है। यह गणना संभावित बिक्री पर आधारित है, वास्तविक लाभ या शुद्ध कमाई पर नहीं।
लातूर और छत्रपति संभाजीनगर में जलापूर्ति की चुनौती
लातूर में पानी के जार बेचने वाले कारोबार का विस्तार इस समस्या की गंभीरता दिखाता है। शहर में करीब 150 जल शुद्धीकरण केंद्र होने की जानकारी सामने आई है। लेख के अनुसार, लातूर में लंबे समय से औसतन चार दिन में एक बार नगर निगम की ओर से पानी की आपूर्ति होती रही है, जबकि अब कुछ जगहों पर अंतराल छह दिन तक पहुंच गया है।
शहर में लगभग 55 मिलियन लीटर प्रतिदिन पानी की आपूर्ति के लिए नगर निगम के स्वामित्व वाले 1,034 बोरवेल होने का उल्लेख है। इनमें से 134 बोरवेल बंद बताए गए हैं, जिन्हें सूखे के दौरान फिर से चालू करने की योजना बनाई जा रही है।
छत्रपति संभाजीनगर में भी जलापूर्ति की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। औद्योगिक गतिविधियों और निवेश के लिए महत्वपूर्ण इस शहर में भी कई इलाकों को चार दिन के अंतराल पर पानी मिलता है। कुछ बस्तियों में नगर निगम की जलवाहिनी तक नहीं पहुंची है, जिसके कारण लोगों को पूरी तरह जार के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है।
जल योजनाओं पर हजारों करोड़ खर्च, फिर भी सवाल बरकरार
मराठवाड़ा में पेयजल योजनाओं पर अब तक 6,980 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने और आगे करीब 5,500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त जरूरत होने का दावा किया गया है। इसके बावजूद कई शहरों और गांवों में नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित नहीं हो सकी है।
क्षेत्र में पानी की कमी के बीच बोतलबंद पानी, शीतल पेय और बीयर बनाने वाली कंपनियों को दिए जाने वाले जल शुल्क पर भी सवाल उठाए गए हैं। लेख में दावा किया गया है कि कुछ कंपनियों के लिए पानी की दर बेहद कम है, जबकि आम लोगों को पीने का पानी खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
मराठवाड़ा की मौजूदा स्थिति सार्वजनिक जलापूर्ति, भूजल प्रबंधन, गन्ने जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों और निजी जल कारोबार के बीच संतुलन बनाने की जरूरत को रेखांकित करती है। सवाल यह है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी जब लोगों को नियमित पीने का पानी नहीं मिल रहा, तो जल योजनाओं का लाभ आखिर जमीन पर कब पहुंचेगा।
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