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नासिक सिंहस्थ कुंभ में पहले अखाड़ों के इष्टदेव और नागा साधु करेंगे अमृत स्नान, इसके बाद आम श्रद्धालुओं को मिलेगा अवसर

13 अखाड़ों की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार होगा स्नान; शैव, वैष्णव और उदासीन संप्रदायों की अलग-अलग धार्मिक परंपराएं हैं विशेष आकर्षण

न्यूज़म ब्यूरो

नासिक, 3 नवंबर। नासिक सिंहस्थ कुंभ मेले में अमृत स्नान की परंपरा बेहद विशिष्ट और धार्मिक महत्व वाली है। इस दौरान सबसे पहले अखाड़ों के इष्टदेव को स्नान कराया जाता है। इसके बाद आचार्य, महामंडलेश्वर, संत-महंत और नागा साधु अमृत स्नान करते हैं। सभी अखाड़ों की स्नान प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आम श्रद्धालुओं को नदी में स्नान करने का अवसर दिया जाता है। यह परंपरा सनातन धर्म की धार्मिक मान्यताओं, अनुशासन और अखाड़ों की प्राचीन व्यवस्था को दर्शाती है।

धर्म ध्वजारोहण के साथ कुंभ की शुरुआत

नासिक सिंहस्थ कुंभ मेले का औपचारिक आगाज धर्म ध्वजारोहण के साथ हो चुका है। अब श्रद्धालुओं को कुंभ के सबसे प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शामिल अमृत स्नान का इंतजार है।

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अमृत स्नान के दौरान जब सोने-चांदी के सिंहासनों पर विराजमान आचार्य, महामंडलेश्वर, जगद्गुरु और महंत हाथियों, घोड़ों तथा रथों पर सवार होकर भव्य शोभायात्रा के साथ नदी तट पर पहुंचते हैं, तो यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है। नागा संन्यासियों की बड़ी संख्या में मौजूदगी इस आयोजन को और विशिष्ट बनाती है।

इष्टदेव के स्नान से शुरू होती है धार्मिक प्रक्रिया

सनातन परंपरा के अनुसार अमृत स्नान का एक निर्धारित क्रम होता है। सबसे पहले संबंधित अखाड़ों के इष्टदेव को देवताओं के प्रतीक स्वरूप स्नान कराया जाता है। इसके बाद आचार्य और महामंडलेश्वर, फिर संत-महंत तथा अन्य साधु-संन्यासी स्नान करते हैं। सभी अखाड़ों की निर्धारित स्नान प्रक्रिया पूरी होने के बाद आम श्रद्धालुओं को नदी में डुबकी लगाने की अनुमति मिलती है।

सनातन धर्म में 13 अखाड़ों को मान्यता

सनातन धर्म की रक्षा, साधना और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण में अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। परंपरागत रूप से 13 अखाड़ों को मान्यता प्राप्त है। उपासना पद्धति, विचारधारा और आराध्य देव के आधार पर इन्हें मुख्य रूप से तीन परंपराओं में बांटा गया है। इनमें शैव, वैष्णव और उदासीन-निर्मल परंपराएं शामिल हैं।

शैव परंपरा के अखाड़ों में भगवान शिव और उनसे संबंधित देवी-देवताओं की उपासना की जाती है। इन अखाड़ों की विशेष पहचान नागा संन्यासी हैं, जो कठोर साधना और वैराग्यपूर्ण जीवन के लिए जाने जाते हैं।

वैष्णव साधु कहलाते हैं बैरागी

वैष्णव परंपरा के साधुओं को बैरागी कहा जाता है। इस संप्रदाय में भगवान विष्णु तथा उनके विभिन्न अवतारों की उपासना की जाती है। विशेष रूप से भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की भक्ति का महत्वपूर्ण स्थान है।

श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़े के प्रमुख आराध्य देव मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं। श्री पंच निर्वाणी अनी अखाड़े के इष्टदेव संकटमोचन हनुमान हैं, जबकि श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़े के मुख्य आराध्य देव भगवान श्रीराम माने जाते हैं।

आस्था और धार्मिक परंपराओं का भव्य संगम

कुंभ मेले का अमृत स्नान केवल नदी में डुबकी लगाने की धार्मिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह अपने इष्टदेव के प्रति श्रद्धा, समर्पण और सनातन संस्कृति की विविध परंपराओं का प्रदर्शन भी है।

प्रत्येक अखाड़ा अपने संप्रदाय के धार्मिक प्रतीकों, छत्र-निशान, विशिष्ट वेशभूषा और परंपराओं के साथ नदी तट पर पहुंचता है। साधुओं की अलग-अलग वेशभूषा, धार्मिक प्रतीक, साधना पद्धति और स्नान का निर्धारित क्रम भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करता है। यही कारण है कि नासिक सिंहस्थ कुंभ का अमृत स्नान देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण बना रहता है।

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