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भाजपा का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगे हैं राहुल गांधी

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लेखक : पंडित मोहन लाल बड़ौली

प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा हरियाणा

राहुल गांधी की अगुवाई में और उनके द्वारा उत्तेजना के माध्यम से कांग्रेस के लोगों का जो आचरण रहा है, उससे यह स्पष्ट होता है कि राहुल गांधी स्वयं लोकतांत्रिक प्रक्रिया, लोकतांत्रिक शुचिता, संवैधानिक मर्यादा और संसद की नियमावली, इनमें से किसी को भी नहीं मानते। उनका रवैया मानो यह हो कि जो उनके मन में आएगा, वही करेंगे। इसी प्रवृत्ति का परिणाम है कि उनकी पार्टी की स्थिति सबके सामने है। जिस दिन वे संसद में खुराफात कर रहे थे, उसी दिन महाराष्ट्र के जिला परिषद के परिणाम आ रहे थे, जहां कांग्रेस पार्टी साफ हो गई और नगर निगमों में भी उसका यही हाल रहा।

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बेहतर होता कि वे अपनी पार्टी की चिंता करते, लेकिन यह अत्यंत चिंताजनक है कि राहुल गांधी का पूरा राजनीतिक आचरण अब अराजकता का प्रतीक बनता जा रहा है। न नियमों का सम्मान करते हैं, न संसदीय प्रक्रिया का सम्मान करते हैं, न संवैधानिक मर्यादा का और न ही लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करते हैं। उन्होंने सोरोस के पेपर को लेकर किस प्रकार दुनिया में भारत को बदनाम करने का प्रयास किया, जबकि वह स्वयं उन तथ्यों से पीछे हट गए और उस पेपर की कोई विश्वसनीयता नहीं रही। यह भी स्पष्ट था कि उसे कौन फंड कर रहा था और फंड करने वालों का एंटी-इंडिया एजेंडा पूरी तरह स्पष्ट था।

पेगासस का मुद्दा भी इसी प्रकार उठाया गया और मोबाइल फोन को लेकर देशभर में अभियान चलाया गया। जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिनको शिकायत है वे अपना मोबाइल जमा करें, तब उन्होंने अपना मोबाइल भी नहीं दिया। इससे पहले वे अमेरिका, लंदन, मलेशिया और सिंगापुर गए और जहां-जहां गए, वहां कहा कि भारत में लोकतंत्र खत्म हो गया है। विदेशों में भारत के लोकतंत्र को बदनाम करना उनकी आदत बन गई है और इसका एक ही कारण है, वे आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से नफरत करते हैं कि वे कैसे प्रधानमंत्री बन गए। यदि उन्हें जनता का वोट नहीं मिलता, तो उसमें कोई क्या कर सकता है?

2009 में अमेरिकी राजदूत से राहुल गांधी ने कहा था कि ‘सीमा पार से होने वाला आतंकवाद उतना महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन मुझे हिंदू उग्रवाद को लेकर अधिक चिंता है।’ चीन के मुद्दे पर भी उनका रुख संदिग्ध रहा है और सेना के मनोबल को तो उन्होंने हमेशा गिराने का प्रयास किया है। उन्होंने बालाकोट और उरी का भी सबूत मांगा। हाल ही में जनरल नरवणे की पुस्तक के संदर्भ में जब प्रकाशक ने स्पष्ट कर दिया कि वह पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है, तब भी वे उस पुस्तक को दिखा रहे हैं। जब पुस्तक प्रकाशित ही नहीं हुई, तो राहुल गांधी के पास वह पुस्तक कहां से आई? उन्हें यह स्पष्ट करना पड़ेगा कि उन्हें किताब कहां से मिली?

अब इसी सत्र की घटनाओं पर ध्यान दिया जाए, एक सिख सदस्य, जो मंत्री हैं, उन्हें देशद्रोही कहा गया। इसके बाद स्पीकर महोदय को ‘यार’ कहा गया, जिस पर विरोध भी दर्ज कराया गया है। फिर उनके निर्देश पर उनकी महिला सदस्यों ने आकर माननीय प्रधानमंत्री की सीट को घेर लिया। यदि स्पीकर महोदय ने हस्तक्षेप न किया होता, तो कोई भी घटना हो सकती थी, क्योंकि जिस प्रकार आदरणीय प्रधानमंत्री की सीट को घेरा गया, उसके वीडियो सार्वजनिक हैं। स्पीकर के चेंबर में जाकर उनके लोगों ने उन्हें बदनाम किया, उसका वीडियो भी सामने आ चुका है।
राहुल गांधी यदि अलोकतांत्रिक आचरण करना चाहते हैं तो वह अपनी पार्टी के भीतर करें, किंतु संसद में ऐसा आचरण स्वीकार्य नहीं है। संसद की मर्यादा का ध्यान रखना अनिवार्य है। भारतीय जनता पार्टी राहुल गांधी के पूरे आचरण की भर्त्सना करती है। भाजपा इस उग्र अराजक, अलोकतांत्रिक और राजनीतिक रूप से असभ्य व्यवहार की कड़ी निंदा करती है।

राहुल गांधी वही व्यक्ति हैं जिन्होंने 2013 में, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह विदेश यात्रा पर थे, कैबिनेट द्वारा अनुमोदित एक अध्यादेश को वरिष्ठ पत्रकारों को बुलाकर उनके सामने फाड़कर हवा में उछाल दिया था। राहुल गांधी ने हाल ही में कहा था कि भारत एक “डेड इकॉनमी” है। किसी भी शब्द का उपयोग करने से पहले उसका अर्थ समझ लेना चाहिए, डेड वह होती है जिसमें जीवन न हो, जबकि देश की अर्थव्यवस्था ने पिछले क्वार्टर में 8.2 प्रतिशत और उससे पहले 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। बाहर किसी के कथन को दोहराकर देश की अर्थव्यवस्था को मृत कहना तथ्यहीन है। राहुल गांधी को देश के जनमानस से माफ़ी मांगनी चाहिए।

 

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