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NSA अजित डोभाल के “इतिहास का प्रतिशोध” बयान पर छिड़ा सियासी घमासान

न्यूज़म ब्यूरो 

नयी दिल्ली। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल के एक बयान के बाद देश की राजनीति में तीखी बहस छिड़ गई है। हाल ही में‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग- 2026’कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित करते हुए डोभाल ने कहा कि “हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है।” उनके इस बयान को लेकर विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उससे जुड़े नेताओं ने उनका समर्थन किया है।

कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान अजित डोभाल ने भारत के ऐतिहासिक संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी सौभाग्यशाली है कि वह एक स्वतंत्र भारत में जन्मी है। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा स्वतंत्र नहीं रहा और देश के पूर्वजों ने आज़ादी के लिए भारी क़ुर्बानियाँ दीं।

डोभाल ने कहा, “हमारे पूर्वजों ने अपमान, असहायता और अत्याचार झेले। भगत सिंह को फांसी स्वीकार करनी पड़ी, सुभाष चंद्र बोस ने जीवनभर संघर्ष किया, महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का रास्ता अपनाया और अनगिनत लोगों ने अपने प्राण न्योछावर किए।”

उन्होंने ऐतिहासिक पीड़ाओं का उल्लेख करते हुए कहा, “हमारे गांव जलाए गए, हमारी सभ्यता को समाप्त करने की कोशिश की गई, हमारे मंदिरों को लूटा गया और हम मूक दर्शक बनकर देखते रहे। इतिहास हमें एक चुनौती देता है। प्रतिशोध शब्द अच्छा तो नहीं है, लेकिन प्रतिशोध भी अपने आप में एक बड़ी शक्ति होती है।”

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डोभाल ने आगे कहा, “हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है और देश को फिर उस ऊंचाई पर पहुंचाना है, जहां हम अपने अधिकारों, विचारों और आस्थाओं के आधार पर एक महान भारत का निर्माण कर सकें।”

एनएसए ने यह भी कहा कि भारत की सभ्यता कभी आक्रामक नहीं रही। “हमने न किसी के मंदिर तोड़े, न कहीं जाकर लूटपाट की और न ही बाहरी आक्रमण किए। लेकिन हम अपनी सुरक्षा को समझने में चूक गए। इतिहास ने हमें सबक सिखाया है और अगर आने वाली पीढ़ियां उस सबक को भूल गईं, तो यह देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी होगी।”

डोभाल के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। वहीं बीजेपी नेताओं का कहना है कि डोभाल का आशय हिंसा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक चेतना और राष्ट्रीय आत्मसम्मान को जागृत करना है।

इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी बहस देखने को मिल रही है, जहां एक वर्ग इसे राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा बता रहा है, तो दूसरा वर्ग इसे विभाजनकारी भाषा करार दे रहा है।

 

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