लेखिका : डा. प्रिंसी चाहर
जिला उपाध्यक्ष, गुरुग्राम महानगर
भारत के लोकतांत्रिक सफर में नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी पहल के रूप में सामने आया है। यह अधिनियम संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करता है, जो केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने का माध्यम नहीं है, बल्कि देश की निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की सशक्त और सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करने का एक दूरदर्शी निर्णय है।
लंबे समय से भारतीय राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रही है। जबकि महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, खेल, प्रशासन और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं, फिर भी नीति निर्माण के उच्च स्तरों पर उनकी भागीदारी सीमित रही। ऐसे में यह अधिनियम उस असंतुलन को दूर करता है और महिलाओं को निर्णय लेने की मुख्यधारा में लाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से नीति निर्माण की दिशा और गुणवत्ता दोनों में बदलाव आएगा। महिलाएं समाज के विभिन्न पहलुओंकृविशेषकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, लैंगिक समानता और बाल विकासकृसे जुड़ी चुनौतियों को अधिक संवेदनशीलता और व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझती हैं। जब वे संसद और विधानसभाओं में अपनी आवाज बुलंद करेंगी, तो नीतियों में समावेशिता और सामाजिक न्याय की भावना और मजबूत होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ’महिला-नेतृत्व वाले विकास’ की अवधारणा को वैश्विक मंचों पर भी प्रमुखता से रखा है। उनका मानना है कि महिलाएं केवल विकास की लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास की दिशा तय करने वाली नेतृत्वकर्ता होनी चाहिए। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी सोच को संस्थागत रूप देता है और महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया का केंद्र बनाता है।
महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गई हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान ने बालिकाओं के प्रति सामाजिक सोच में सकारात्मक बदलाव लाया और लिंगानुपात सुधारने में मदद की। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत गरीब परिवारों की महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन प्रदान किए गए, जिससे उनके स्वास्थ्य और जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान किए, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनीं।
इसके अतिरिक्त, सुकन्या समृद्धि योजना ने बालिकाओं के भविष्य को सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जबकि जन धन योजना के माध्यम से करोड़ों महिलाओं को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया, जिससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला। स्टार्ट अप इंडिया और महिला ई-हाट जैसी पहल ने महिला उद्यमिता को नई दिशा दी है।
हरियाणा राज्य ने भी महिलाओं के सशक्तिकरण में उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। लाडो- लक्ष्मी योजना के तहत बेटियों को आर्थिक रूप से मजबूत किया जा रहा है। आपकी बेटी, हमारी बेटी योजना ने कन्या भ्रूण हत्या जैसी गंभीर सामाजिक समस्या को कम करने में योगदान दिया है द्य इस योजना के तहत, पहली या दूसरी बेटी के जन्म पर, सरकार स्प्ब् के माध्यम से ₹21,000 का निवेश करती है, जो 18 वर्ष की आयु पूरी होने पर मिलती है।। इसके साथ ही, महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहित कर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा रहा है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम इन सभी प्रयासों को एक नई गति प्रदान करेगा। जब महिलाएं नीति निर्माण का अभिन्न हिस्सा बनेंगी, तो वे अपने अनुभवों और जमीनी समझ के आधार पर अधिक प्रभावी और व्यावहारिक नीतियां बना सकेंगी। इससे लोकतंत्र अधिक प्रतिनिधिक, समावेशी और उत्तरदायी बनेगा।
यह अधिनियम केवल राजनीतिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का आधार भी है। यह आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं को यह संदेश देता है कि वे केवल घर या समाज की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के सर्वोच्च निर्णय लेने वाले मंचों तक उनकी पहुंच है।
अंततः, नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत को उस दिशा में ले जाता है जहां महिलाएं केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता बनकर उभरेंगी। यह अधिनियम ‘सशक्त नारी, सशक्त भारत’ के सपने को साकार करने की दिशा में एक मजबूत और निर्णायक कदम है।