भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 एक युगांतरकारी पहल के रूप में सामने आया है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि महिलाओं को राजनीति में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी मिले। 2029 लोक-सभा चुनाव से ही यह भागीदारी महिलाओं को मिले, इसके लिए इस बार लोकसभा में यह अधिनियम रखा जाएगा, यह केवल एक संवैधानिक संशोधन नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी को निर्णय प्रक्रिया में जल्दी से जल्दी समान भागीदारी देने का मजबूत संकल्प है। इस अधिनियम के तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण सुनिश्चित किया गया है। यह कदम न केवल महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि समावेशी और संतुलित विकास के लिए भी आवश्यक है।
महिलाओं का सशक्तिकरण केवल समानता का मुद्दा नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज निर्माण का आधार है। वैश्विक शोध लगातार यह दर्शाते हैं कि जब महिलाएं कार्यबल में अधिक संख्या में शामिल होती हैं, तो अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है और आय में समानता आती है। यदि लैंगिक अंतर को कम किया जाए, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में ट्रिलियन डॉलर का इजाफा संभव है।
भारत में पिछले एक दशक में महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर व्यापक परिवर्तन हुए हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लगभग 72 प्रतिशतघर महिलाओं के नाम पर हैं, जो उन्हें सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित में 43 प्रतिश्ज्ञत महिला स्नातकों की भागीदारी देश के बदलते शैक्षणिक परिदृश्य को दर्शाती है। मुद्रा योजना के 69 प्रतिशत ऋण महिलाओं को दिए गए हैं, स्टैंड-अप इंडिया योजना के 84 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं अब केवल घर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
सरकार की कई योजनाओं ने महिलाओं के जीवन स्तर में महत्वपूर्ण सुधार किया है। उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ से अधिक गैस कनेक्शन दिए गए, जिससे महिलाओं को धुएं से मुक्ति मिली। जल जीवन मिशन के माध्यम से करोड़ों घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचा है। स्वच्छ भारत मिशन ने खुले में शौच की समस्या को खत्म कर महिलाओं की गरिमा और स्वास्थ्य दोनों को सुरक्षित किया।
हालांकि, इन सभी प्रगतियों के बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी सीमित रही है। 1952 में लोकसभा में केवल 22 महिलाएं थीं, जो 2024 तक बढ़कर 75 हुई हैं, लेकिन यह संख्या अभी भी पर्याप्त नहीं है। राज्यसभा में भी महिलाओं की भागीदारी लगभग 17 प्रतिशत के आसपास है। इसके विपरीत, पंचायत स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 46 प्रतिश है, जहां उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, जल और स्वच्छता जैसे मुद्दों पर सकारात्मक बदलाव लाए हैं।
यही अनुभव यह साबित करता है कि जब महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिलता है, तो वे केवल पद नहीं संभालतीं, बल्कि शासन को अधिक प्रभावी और संवेदनशील बनाती हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी अनुभव को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का प्रयास है। यह कानून महिलाओं को केवल मतदाता नहीं, बल्कि नीति निर्माता के रूप में स्थापित करेगा।
कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि जब महिलाओं की भागीदारी पहले से बढ़ रही है, तो आरक्षण की आवश्यकता क्यों है। इसका सरल उत्तर यह है कि भागीदारी और प्रतिनिधित्व हमेशा एक साथ नहीं बढ़ते। इसलिए संतुलन स्थापित करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक होता है।
पिछले वर्षों में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में भी मजबूत आधार तैयार हुआ है। करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले हैं, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। “लखपति दीदी” और “नमो ड्रोन दीदी” जैसी पहलें महिलाओं को तकनीकी और आधुनिक क्षेत्रों में आगे बढ़ा रही हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। लड़कियों के स्कूलों में नामांकन में वृद्धि हुई है। पीएचडी में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम का सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि नीति निर्माण में महिलाओं की प्राथमिकताएं अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएंगी।
अंततः, यह अधिनियम केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक कदम है। जब देश की आधी आबादी नेतृत्व में आगे आएगी, तभी विकास वास्तव में समावेशी, संतुलित और टिकाऊ बन पाएगा।

लेखक :
उषा प्रियदर्शी
प्रदेश अध्यक्ष
भाजपा महिला मोर्चा, हरियाणा