गुवाहाटी। असम की भोर उस दिन मातम बनकर उतरी, जब सैरांग–नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस की रफ्तार जंगल की नब्ज से टकरा गई। होजाई जिले के चांगजुराई इलाके में तड़के करीब 2:17 बजे हाथियों का एक झुंड रेल पटरी पार कर रहा था—शायद रोज़ की तरह, शायद सुरक्षित गलियारे की तलाश में। लेकिन इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया। तेज़ रफ्तार ट्रेन की चपेट में आकर सात हाथियों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, एक गंभीर रूप से घायल हो गया। टक्कर इतनी भयावह थी कि ट्रेन के पांच डिब्बे पटरी से उतर गए, हालांकि यात्रियों की जान बच गई।
वन अधिकारियों के अनुसार, यह इलाका हाथियों के आवागमन का पारंपरिक रास्ता है। जंगल और रेल की रेखाएँ यहां बार-बार एक-दूसरे से टकराती रही हैं—और हर टक्कर में प्रकृति हारती है। टूटे हुए पेड़, खामोश पड़े विशाल शरीर और पटरी पर बिखरा सन्नाटा इस बात की गवाही दे रहे थे कि विकास की रफ्तार ने फिर एक बार जीवन की आवाज़ दबा दी।
जानकारों का मानना है कि भारत में हाथियों की अप्राकृतिक मौतों का सबसे बड़ा कारण रेल हादसे बनते जा रहे हैं। सेंसर, एआई सिस्टम, अंडरपास और चेतावनियों की योजनाएँ काग़ज़ों पर हैं, मगर जंगल की रातें अब भी असुरक्षित हैं। यह हादसा सिर्फ़ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि यदि इंसान और प्रकृति के बीच संतुलन नहीं साधा गया, तो ऐसी सुर्खियाँ बार-बार हमारे सामने आएंगी।