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BRICS समिट में UPI का दबदबा! डॉलर पर निर्भरता घटाने के लिए पेमेंट सिस्टम जोड़ने की तैयारी

BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में भुगतान को आसान बनाने पर जोर, फास्ट पेमेंट सिस्टम और CBDC को जोड़ने के विकल्पों पर चर्चा; भारत का UPI मॉडल बन सकता है अहम आधार

Rahul Gupta

नई दिल्ली, 4 सितंबर।

भारत में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में कारोबार और निवेश के साथ वैश्विक भुगतान व्यवस्था को लेकर भी अहम चर्चा होने वाली है। BRICS देशों के बीच डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान को आसान बनाने के लिए क्रॉस-बॉर्डर डिजिटल पेमेंट्स तथा सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC को आपस में जोड़ने के विकल्पों पर काम चल रहा है।

इस पूरी कवायद में भारत का UPI मॉडल खास महत्व रखता है। भारत का प्रयास है कि जिस तरह UPI ने देश के भीतर बैंक खातों के बीच तत्काल डिजिटल भुगतान को आसान बनाया है, उसी तरह BRICS देशों के अलग-अलग फास्ट पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ा जा सके। इससे दो BRICS देशों के बीच भुगतान में हर बार डॉलर को मध्यस्थ मुद्रा के रूप में इस्तेमाल करने की जरूरत कम हो सकती है।

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RBI ने पेमेंट सिस्टम लिंक करने के विकल्पों की पुष्टि की

भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से भी BRICS के भीतर फास्ट पेमेंट सिस्टम को लिंक करने और CBDC की इंटरऑपरेबिलिटी जैसे विकल्पों पर चर्चा की पुष्टि की गई है। हालांकि, अभी किसी एक मॉडल को अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

इस प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था तैयार करना है, जिससे सदस्य देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में लेनदेन कर सकें और भुगतान के निपटान के लिए बेहतर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल किया जा सके।

नई BRICS करेंसी नहीं, पहले पेमेंट कनेक्टिविटी

BRICS में डॉलर से दूरी की चर्चा अक्सर किसी साझा BRICS करेंसी से जोड़कर देखी जाती है, लेकिन मौजूदा कोशिश उससे अलग है। फिलहाल लक्ष्य कोई नई साझा मुद्रा जारी करना नहीं, बल्कि मौजूदा राष्ट्रीय मुद्राओं और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ना है।

यानी भारत और रूस के बीच रुपये-रूबल में या दूसरे BRICS देशों के बीच उनकी अपनी-अपनी मुद्राओं में कारोबार और भुगतान को आसान बनाने के लिए एक बेहतर डिजिटल व्यवस्था विकसित की जा सकती है। भारत पहले से ही BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान बढ़ाने की पैरवी करता रहा है। ऐसे में डिजिटल पेमेंट कनेक्टिविटी इस रणनीति का अगला कदम बन सकती है।

भारतीय कारोबारियों को मिल सकता है बड़ा फायदा

इस व्यवस्था का बड़ा फायदा BRICS देशों के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों को मिल सकता है। स्थानीय मुद्राओं में सीधे और तेज भुगतान की व्यवस्था बनने से लेनदेन की प्रक्रिया आसान और कम खर्चीली होने की संभावना है।

इसके साथ ही रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ावा देने की भारत की कोशिशों को भी मजबूती मिल सकती है। भारत पहले से ही UPI को दूसरे देशों के डिजिटल पेमेंट सिस्टम के साथ जोड़ने पर काम कर रहा है। ऐसे में BRICS के भीतर पेमेंट इंटरऑपरेबिलिटी भारत को अपने डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता दिखाने का बड़ा अवसर दे सकती है।

चीन समेत कई देशों के सामने बड़ी चुनौतियां

BRICS के लिए ऐसा साझा पेमेंट नेटवर्क तैयार करना आसान नहीं होगा। सदस्य देशों की बैंकिंग व्यवस्था, करेंसी, वित्तीय नियम और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर एक-दूसरे से काफी अलग हैं। इसके अलावा करेंसी रिस्क, लिक्विडिटी, साइबर सिक्योरिटी, डेटा प्रोटेक्शन और वित्तीय अपराधों की रोकथाम जैसे मुद्दों पर भी साझा व्यवस्था विकसित करनी होगी।

खास तौर पर चीन जैसे बड़े सदस्य देश के अपने डिजिटल पेमेंट और वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर को देखते हुए इंटरऑपरेबिलिटी के साथ डेटा और सुरक्षा से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण होंगे। अलग-अलग देशों के नियमों और तकनीकी प्रणालियों को एक साथ लाना इस पूरी योजना की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हो सकता है।

डॉलर को खत्म करना नहीं, विकल्प तैयार करना लक्ष्य

मौजूदा स्थिति को सीधे डॉलर को खत्म करने की योजना के तौर पर देखना सही नहीं होगा। BRICS की मौजूदा दिशा ज्यादा व्यावहारिक नजर आती है। इसका फोकस ऐसे वैकल्पिक भुगतान रास्ते तैयार करने पर है, जिनके जरिए सदस्य देश जरूरत के मुताबिक डॉलर पर निर्भर हुए बिना आपस में कारोबार और भुगतान कर सकें।

अगर दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में इस दिशा में ठोस प्रगति होती है, तो इसका असर केवल BRICS देशों के बीच भुगतान व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। यह भारत के UPI और डिजिटल भुगतान मॉडल के लिए वैश्विक स्तर पर एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है।

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