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यूजी के मास्टर जांच रहे पीजी की कॉपियां

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बोर्ड ऑफ स्टडीज से भेजे गए नाम के इतर मास्टरों से कराया जा रहा मूल्यांकन

खास लोगों को उपकृत कर रहा लविवि का मूल्यांकन सेल 

 

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शिक्षा संवाददाता

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय का मूल्यांकन सेल नियमों से नहीं अपनी मनमानी से चल रहा है। यहां पर परास्नातक विषयों की कॉपियों का मूल्यांकन स्नातक के शिक्षक कर रहे हैं, यही नहीं इनमें कई तो ऐसे हैं, जो प्राइवेट कॉलेजेस के हैं जबकि कई तो सिर्फ पीएचडी स्कॉलर ही हैं। 

लखनऊ विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में धांधली उजागर हो चुकी है, लविवि परीक्षाओं की निगरानी करने के लिए मुख्यमंत्री ने आदेशित किया था, जिसके बाद लाखों रुपए खर्च करके वेब कास्टिंग एवं मॉनिटरिंग प्रकोष्ठ बनाया गया है लेकिन विद्यानंद त्रिपाठी ने एक रिटायर्ड मास्टर को लगाकर उसके अंदर पत्रकारों को घुसने के लिए मना करा दिया। पत्रकार अंदर जाकर परीक्षाओं में हो रही धांधली को पकड़ न लें, इसके लिए उन्होंने बाकायदा कई गार्ड भी लगा रखे हैं।

बहरहाल कापियों के मूल्यांकन में तो लखनऊ विश्वविद्यालय ने कम धांधली नहीं मचाई है। मूल्यांकन सेल का प्रभारी जिस महिला को बनाया गया है, वह स्वास्थ्य कारणों की वजह से सीढ़ियां नहीं चढ़ पाती, लेकिन चूंकि वह आर्ट्स के स्नातक और परास्नातक सेल के इंचार्ज की बहन है, ऐसे में उन्हें तत्कालीन कुलपति आलोक राय ने संबंधों या मिलीभगत के चलते इंचार्ज बना दिया था। फिलहाल वह महिला प्रथम तल पर चढ़ नहीं पाती हैं, इसलिए वह ग्राउंड फ्लोर पर ही बैठी रहती हैं, जबकि मूल्यांकन प्रथम और द्वितीय तल पर भी होता है, जिसको झांकने इंचार्ज नहीं जा पाती है।

यही नहीं सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि परास्नातक की कॉपियों का मूल्यांकन करने के लिए स्नातक के कई सारे मास्टर लगे हुए हैं। इनमें कईयों के नाम तो बोर्ड ऑफ स्टडीज से पास भी नहीं है, और कई लोग पीएचडी स्कॉलर हैं जबकि गोपनीयता ताख पर रख करके कई ऐसे शिक्षकों से भी कॉपियां जँचवायी जा रही है, जो प्राइवेट कॉलेज में मास्टरी कर रहे हैं।

दरअसल लखनऊ विश्वविद्यालय कॉपियों को जांचवाने का काम गोपनीयता के नाम पर करता है और इसी गोपनीयता का फायदा उठाकर सेल इंचार्ज अपने चहेतों से कॉपियां जचवाकर उन्हें उपकृत कर रहे हैं। नियम यह है कि लविवि के साथ ही एडेड डिग्री कॉलेजों और राजकीय डिग्री कॉलेज के शिक्षकों को बाकायदा टीए/डीए देकर लखनऊ के अलावा चार अन्य जिलों से कॉपियां चेक करने के लिए बुलवाया जाता है।

डिग्री कॉलेज के इन सभी शिक्षकों को बोर्ड ऑफ स्टडीज से नाम भेजे जाते हैं और उनकी ड्यूटी भी लगाई जाती है, लेकिन इसके बावजूद भी शिक्षकों की कमी या अपने लोगों को ज्यादा से ज्यादा उपकृत करने के चक्कर में मूल्यांकन सेल के नियमों को ताख पर रखकर परास्नातक विषयों की कॉपियों को स्नातक के मास्टर चेक कर रहे हैं।

 

मूल्यांकन करने आए मास्टरों के भोजन में भी कमीशनखोरी

मूल्यांकन सेल के दौरान शिक्षकों के लिए आने वाले नाश्ते और खाने में भी जमकर कमीशन खोरी होती है। कई कई दिन तो समोसे और चाय पर ही टरका दिया जाता है जबकि उनके लिए भोजन तक का भुगतान विश्वविद्यालय स्तर से होता है लेकिन वह सब कागजों पर ही दिखाकर बंदरबांट कर लिया जाता है।

दरअसल यह सभी शिक्षक कहीं ना कहीं विश्वविद्यालय के शिक्षकों से टच में रहते हैं, ऐसे में वे शिकायत करने में संकोच करते हैं, खासतौर से महिलाएं अपने साथ हो रहे दोयम दर्जे का व्यवहार को भी छुपा ले जाती हैं। ऐडेड डिग्री कॉलेज के मास्टरों को अदृश्य भय का भी खतरा रहता है, इस वजह से वे शिकायत नहीं करते हैं, इसी का फायदा उठाते हुए सेल इंचार्ज मनमानी पर जुटे हुए हैं और लाखों रुपए कमा रहे हैं।

लखनऊ विश्वविद्यालय में जहां आर्ट विषयों की स्नातक और परास्नातक कॉपियों के मूल्यांकन का जिम्मा अनित्य गौरव के पास पिछले कई वर्षों से है, तो वहीं साइंस के तमाम विषयों का जिम्मा पंकज माथुर के पास है। पंकज माथुर एडमिशन के काम में भी अनित्य गौरव के साथ हमजोली हैं। जबकि राममिलन यादव को कॉमर्स की कॉपियां जांचवाने का काम भी पिछले दिनों आलोक राय से कहकर के लूटा के ही एक पदाधिकारी ने दिलवाया था।

सेल से होने वाली कंटीन्जेंसीज और अन्य की कमाई में कुछ ना बोलने की कीमत कई मास्टरों को मिली। लूटा महामंत्री के चुनाव में प्रशासनिक कैंडिडेट के रूप में आखिरी मुहर तत्कालीन कुलपति आलोक राय से लगवाई गई थी। इसके अलावा लॉ के विषयों की कॉपियों को जांचने का जिम्मा न्यू कैंपस वाले अनुराग श्रीवास्तव के पास है, जबकि मैनेजमेंट की कॉपी आनंद विश्वकर्मा को मिल गया है।

आईएमएस की डायरेक्टर विनीता काचर ने और पिछले दिनों नौकरी के विवाद में फंसे विमल जायसवाल ने भी कुछ दिनों तक कॉमर्स और मैनेजमेंट की कॉपियों को जांचवाने का काम संभाले रखा। मिलीभगत के चलते ही कोई भी एक दूसरे की पोल पट्टी नहीं खोलता और अव्यवस्थाओं को छोटे शिक्षकों पर थोपे रखता है। डिग्री कॉलेज में काम करने वाले शिक्षक विश्वविद्यालय के मास्टरों से भिड़ना नहीं चाहते, यही कारण है कि वह भोजन की जगह पर समोसे और चाय नाश्ते की चिरकुटई की शिकायत इधर-उधर नहीं करते क्योंकि उन्हें पता है कि आगे से कापियों को जाँचने का काम मिलना बंद हो जाएगा।

यही कारण है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के मूल्यांकन सेल में लगातार मनमानी की व्यवस्था चल रही है और कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है। पिछले दिनों आरटीआई के माध्यम से भी यह पूछने का प्रयास किया गया था कि किस मूल्यांकन सेल में कौन-कौन शिक्षक ने कितनी कितनी कॉपियां जांची।

इस मामले में भी भांडा ना फूटे, इसलिए आलोक राय ने मिलीभगत के चलते गोपनीयता के नाम पर कोई जवाब नहीं दिलवाया। क्योंकि मूल्यांकन के काम में भी कई प्रकार की गड़बड़ियों के मामले में आलोक राय तक का सीधे हाथ रहा है, ऐसे में देखना है कि नए कुलपति जेपी सैनी इन अवयवस्थाओं को बदलते हैं कि इसी ढर्रे में खुद भी रम जाते हैं।

 

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