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देश की आधी आबादी की आवाज़ को करना होगा अभी और इंतज़ार !

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लेखक : रेखा शर्मा
राज्यसभा सांसद (हरियाणा)
पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग

आज भारतीय संसद का बजट सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। हर बार की तरह इस बार भी संसद ने देशहित से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की, कई निर्णय लिए और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने का कार्य किया। सरकार ने अनेक अवसरों पर विपक्ष के अनुरोधों का सम्मान किया, संवाद के लिए अतिरिक्त समय दिया और सहमति बनाने का निरंतर प्रयास किया। यह लोकतंत्र की वही परंपरा है जो मतभेदों के बीच भी संवाद को जीवित रखती है और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानती है।लेकिन एक महिला सांसद होने के नाते इस सत्र की समाप्ति मेरे लिए केवल संसदीय कार्यवाही का समापन नहीं है। यह एक गहरी भावनात्मक कसक का क्षण भी है। क्योंकि इस बार अधूरी रह गई उम्मीद केवल एक विधेयक की नहीं थी, बल्कि देश की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व के अधिकार की थी।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक कानूनी प्रस्ताव नहीं था। यह उन करोड़ों बेटियों की आशा था जो लोकतंत्र में अपनी भागीदारी को और सशक्त होते देखना चाहती हैं। यह उन माताओं का विश्वास था, जिन्होंने हमेशा समाज और परिवार को दिशा दी, लेकिन निर्णय लेने की सर्वोच्च संस्थाओं में उनकी भागीदारी अब भी सीमित रही। यह उन युवा छात्राओं का सपना था, जो राजनीति को केवल देखने नहीं, बल्कि उसे दिशा देने का साहस रखती हैं। यह उन लाखों महिलाओं की आकांक्षा का प्रतीक था, जो पंचायतों और स्थानीय निकायों में नेतृत्व कर चुकी हैं और अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भागीदारी का विस्तार चाहती हैं।

इस सत्र के दौरान सरकार ने विपक्ष की अनेक मांगों और सुझावों को स्वीकार करते हुए सहमति बनाने का वातावरण तैयार करने की पूरी कोशिश की। लोकतंत्र संवाद से चलता है, और संवाद के लिए सरकार की ओर से निरंतर प्रयास भी हुए। लेकिन इसके बावजूद जिस प्रकार से महिलाओं के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने का यह ऐतिहासिक अवसर आगे नहीं बढ़ सका, उसने देश की करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों को प्रतीक्षा में छोड़ दिया है। यह केवल एक प्रक्रिया का रुकना नहीं था—यह एक भावनात्मक अपेक्षा का ठहर जाना था।

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सोचिए, यदि यह व्यवस्था लागू हो जाती तो 2029 का भारत कैसा होता? संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी दिखाई देती। नीति निर्माण की प्रक्रिया में संवेदनशीलता, संतुलन और सामाजिक समावेशन की नई दिशा मिलती। सबसे महत्वपूर्ण बात देश की बेटियों को यह संदेश मिलता कि उनका लोकतंत्र उन्हें केवल मतदाता नहीं, बल्कि नीति-निर्माता के रूप में भी स्वीकार करता है। यह संदेश आने वाली पीढ़ियों के आत्मविश्वास को नई ऊँचाई देता।

आज भारत की महिलाएँ हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। विज्ञान, सेना, खेल, शिक्षा, प्रशासन और न्यायपालिका तक उनकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। अंतरिक्ष से लेकर सीमा सुरक्षा तक, स्टार्टअप से लेकर सामाजिक नेतृत्व तक, भारतीय नारी ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध की है। ऐसे समय में संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या बढ़ाना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रगति का हिस्सा होना चाहिए था।

यह भी सच है कि जब किसी समाज की आधी आबादी निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से शामिल होती है, तो नीतियाँ अधिक संवेदनशील, समावेशी और दूरदर्शी बनती हैं। महिलाओं की भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ाती। वह लोकतंत्र की गुणवत्ता को भी मजबूत करती है।

मुझे यह कहते हुए पीड़ा हो रही है कि यह अवसर केवल एक संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा बनकर रह गया, जबकि यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन सकता था। यह वह क्षण था जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को यह संदेश देने का अवसर था कि भारत केवल संख्या में नहीं, बल्कि सहभागिता में भी सबसे आगे है।

फिर भी मेरा विश्वास अडिग है। भारत की नारी ने कभी चुनौतियों से पीछे हटना नहीं सीखा। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक हर महत्वपूर्ण परिवर्तन में महिलाओं की भूमिका निर्णायक रही है। आज यह प्रतीक्षा है, लेकिन यह प्रतीक्षा निराशा नहीं है। यह एक संकल्प की भूमिका है।

देश की आधी आबादी केवल अधिकार नहीं मांग रही है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में अपनी समान और प्रभावी भागीदारी का अवसर चाहती है। यह मांग किसी विशेष वर्ग की नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक संतुलन की मांग है। मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में यह आवाज़ और मजबूत होगी, और वह दिन अवश्य आएगा जब संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में सामने आएगी।

क्योंकि यह केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं है।
यह सम्मान का प्रश्न है,
यह समान अवसर का प्रश्न है,
और यह भारत के भविष्य का प्रश्न है।

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