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भगवान को धन, वैभव या वाह्य आडम्बर नहीं, बल्कि प्रिय है हृदय की शुद्ध भक्ति : स्वामी जी

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पंचकूला। श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) माता मनसा देवी परिसर में चल रही श्रीमद्भागवतमहापुराण का आज विश्राम दिवस रहा। कथा के व्यास गुरुकुल के संस्थापकाचार्य स्वामी श्रीनिवासाचार्य जी महाराज ने विश्राम शब्द का अर्थ जनमानस में प्रकट किया कि राम में प्रवेश होना ही विश्राम है।

 

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हरि की कथा के बारे में यह बताया कि जैसे हरि अनन्त है वैसे ही हरि की कथा भी अनन्त है। वह भगवान् सच्चिदानन्दस्वरूप किसी से कुछ नहीं लेते बस देते ही देते हैं।

 

सभी मनुष्य को अपने जीवित काल में दान देना चाहिए परन्तु दान भी सावधानी पूर्वक देना चाहिए, क्योंकि अपात्र को दिया गया दान यजमान के स्वयं नरक जाने का रास्ता है।

 

दान देने से पाप दुलते हैं तथा सेवा करने से मनुष्य पवित्र होता है। भगवान् की माया के आगे जीव की माया नहीं ठहरती अतः जिस पर भगवान् कृपा करें वह माया से विहीन हो जाता है।

 

ऐसे ही भगवान् की जिस पर विशेष कृपा होती है भगवान् उसका धन हरण कर लेते हैं तथा जितना धन उसे देते हैं उस धन का सदुपयोग दान तथा सत्संग आदि में प्रयोग ही उसकी प्रथमगति है।

 

सामाजिक मनुष्य मकड़ी की तरह है वह अपने ही जाल में स्वयं फसता है। ऐसे ही मकड़ी का प्रसंग लेकर दत्तात्रेय भगवान् के 24 गुरुओं का वर्णन बड़े ही विशद रूप से पूज्य गुरुदेव ने बताया।

सुदामा चरित्र के विषय में कहा कि सुदामा चरित्र श्रीमद्भागवतमहापुराण में निष्काम भक्ति, दीनता, मित्रता और वैराग्य का अनुपम आदर्श प्रस्तुत करता है। यह प्रसंग सिखाता है कि भगवान् को धन, वैभव या बाह्य आडम्बर नहीं, बल्कि हृदय की शुद्ध भक्ति प्रिय है।

 

सुदामा अत्यन्त दरिद्र होते हुए भी हृदय से समृद्ध थे। उनके जीवन में अभाव था, परन्तु भगवद् स्मरण की प्रचुरता थी । सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता यह दर्शाती है कि ईश्वर अपने भक्त से समभाव से व्यवहार करते हैं । सुदामा ने कुछ माँगा नहीं, फिर भी भगवान् ने सब कुछ दे दिया । जहाँ माँग नहीं, वहीं अनुग्रह अधिक होता है।

इसी के साथ कलियुग की चर्चा करते हुए भगवन्नानामसंकीर्तन के साथ कथा का विश्राम हुआ तथा सभी भक्तों ने व्यासपीठ से प्रसाद तथा आशीर्वाद ग्रहण किया, तत्पश्चात् सभी ने भोजन प्रसाद ग्रहण किया।

 

श्रीमन्नारायण नारायण हरि हरि।

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