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चर्चा तो है…

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निश्छल भटनागर की कलम से….

 

 

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राजा के साथ हो राजा जैसा व्यवहार 

ख़बरों की भीड़ में इक खबर ने— खींच ही ली नज़र। एक बार फिर नहीं हुआ, राजा के साथ राजा जैसा व्यवहार। बरबस ही आ गई याद— बचपन में पढ़ी किताब में लिखी इक कहानी से जुडी बात। एक राजा ने विपरीत परिस्थितियों में कही थी—-अपने समकक्ष द्वारा पूछे जाने पर यही बात कि —- वैसा ही करिए व्यवहार, जैसा एक राजा को करना चाहिए दूसरे राजा के साथ। लगभग ऐसी कुछ बात का चला था ज़िक्र— तब हरियाणे के हंसमुख सीएम नायब सिंह सैनी ने कही थी वो बात— कि हम तो देते हैं उनको गार्ड ऑफ़ ऑनर— वो खुदवा देते हैं रास्तों में गड्ढे। कह रखा है हमने अपने पुलिस अफसरों से कि— आएं पड़ोसी सूबों के सीएम साहब तो— पूरे सम्मान के साथ दीजिये उनको गॉर्ड ऑफ़ ऑनर— और देखिये ज़रा, हमें दिखाए जाते हैं काले कपड़े। करवा देते हैं धरना और प्रदर्शन— ये भी कोई और नहीं— करते हैं उनकी ही पार्टी के नेता कार्यकर्ता । भई रिश्तेदारी है हमारी पंजाब में, तो क्या आना जाना छोड़ दें— ये भी कोई बात हुई। बोले सीएम सैनी, एक डेरे में जाना था एक आदरणीय संत पुरुष, बाबाजी के पास— पड़ोस में सूचना दी गई, लेकिन वहां के रास्ते में लोग इकठ्ठा कर दिए— एक जगह तो कार्यक्रम का आयोजन रखा गया था, मगर — परमिशन नहीं दी गई— एक बार तो आयोजन स्थल पर गड्ढा ही खुदवा दिया भाई लोगों ने, बताइए—- क्या ऐसा किया जाना चाहिए व्यवहार। मित्रों में चली चर्चा तो बोले वो कि— ऐसा तो ठीक नहीं मेरे यार— स्नेह और भाईचारे की तो— हर किसी को है दरकार, ऐसा ही हो गर आपके साथ व्यवहार— तो लगेगा कैसा, सोचा है कभी आपने  बरखुरदार। राजनीति के पंडित हैं मानते कि —-बेशक माहौल चुनाव की आमद का बन रहा हो, मगर— क्या ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए एक सीएम के साथ पड़ोस में। सवाल उठना लाज़िमी है— अब पंजाब के ही सीएम भगवंत सिंह मान— दूसरे राज्यों में आते जाते रहते हैं, संभवतः वहां उनके साथ तो होता नहीं वैसा— जैसा होता है छोटे भाई के साथ। ये और है कि हैं दोनों ही— जेड केटेगरी के प्रोटेक्टी, मगर कुछ तो लिहाज बनाये रखना ही चाहिए। कलमकारों के बीच चली चर्चा— तो निकल कर आई ये बात कि — लोग आपके रास्ते में गड्ढे करें, तो परेशान मत होइए, क्योंकि या वहॉ लोग हैं, जो आपको छलांग लगाना सिखलाएंगे। ये तो वही बात हुई कि—- जिन्हे रखना होता है खुद का मान, उन्हें देना ही पड़ता है दूसरों को सम्मान। चर्चा ये भी है कि — नायब सैनी की पंजाब में एंट्री— कई लोगों को रही है खूब चुभ, करने लगा है अभी से उनका दिल धुक धुक–।

 

सरकारें ही नहीं, अलादीन के चिराग भी हैं बदलते
कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए है जरूरी, हर बरस इनकम टैक्स की डिटेल भरना। कहां गए, कितनी कहां जमीन खरीदी…ये बताना। चांदी और हीरे जवाहरातों के साथ…कितना जुटाया सोना… मग़र चर्चा तो असली ये है कि…. पॉलिटिशियंस से न पूछता कोई पांच बरस से पहले… कि महाशय, इतना रुपया आप कहाँ से लाए— पेड़ हमको भी वो दिखलाइये ज़रा और बतलाइए — जो पत्ते नहीं, गिराता है रुपए। चर्चा है कि— सरकारें हैं बदलती रहती और बदलते रहते हैं— अलादीन के चिराग। जिसकी रही जब सरकार— रगड़ दिया भाई ने, बिना किसी कि परवाह किए। होता ही रहा है ऐसा, साल दर साल—- सरकार दर सरकार— दशकों से, लगभग हर सूबे में। बहरहाल, चर्चा चल रही है एक महकमे की इन दिनों सबसे ज्यादा — वो ये कि एक सत्ता धारी पार्टी के नन्हे मुन्ने— युवा से दिखने वाले छौने— खैंच रहे हैं, उठा रहे हैं बड़े बड़े टेंडर औने पौने— कोई रोक न दे, टोक न दे— इसलिए लगाते हैं सीएम और—-बड़े बड़े मंत्रियों या अफसरों के साथ की डीपी काट कूटकर— तिरछे तिकोने। ज़ाहिर सी बात है, जलवा तो होगा ही साहब— कोई अध्यक्ष जी की लगाए है सिफारिश तो— किसी में है किसी की हिस्सापंती। अफसर भी हैं जानते सब, मगर—- वो कहते हैं न कि इस हम्माम में सब — हैं, चंगे हैं। फिर दूसरी बात ये कि — पानी में वो भी रहते हैं, और रहते हैं बड़े बड़े जलीय जीव भी—- मगरमच्छ भी, तो क्यों टकराना। जो पूछे उसे यही बताना, अपने पास तो है सिर्फ— तनख्वाह का आना, बाकी न मांगें हम किसी से नज़राना। चर्चा है कि — माननीयों के कैंप ऑफिसेस में पाँव पसारे बैठे— मुंह लगों ने भी फैला रखा है झामा, बना रखा है पूरा ड्रामा— वो भी फुल फेज में। ऊपर तक हुई भी है शिकायत कि— कैंप ऑफिस ही बना हुआ है असली, सचिवालय तो बस दिखाने वाले हैं दांत। चर्चा ये भी कि —-इस बड़े खेल की लीकेज हो गई है कहीं। जल्दी ही खुलेंगे— बिखरेंगे, दिखेंगे पत्ते खेल में — होंगे वो जगजाहिर और आम—-तब मिल जायेंगे माहिरों को गुठलियों के दाम।

 

काश, होती जो सुनवाई, तो न होती बेज़ुबानों की कटाई !

अब पछताए क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत—- मुहावरा आ रहा है ये याद। बीती 22 सितम्बर 25 को की  थी हमने चर्चा वो, जो थी सरकार के ज्ञान चक्षु को— खोलने वाली– एक अफसर की मनमानी को—- समय रहते सुधार देने वाली। चर्चा का शीर्षक था– बिना गॉर्ड के कैसी प्रोटेक्शन। बताया गया था उसमें कि कैसे —- बिना मुख्यमंत्री को बताए या CMO के अफसरों को इत्तेलाह दिए— उनकी मंजूरी लिए— और कुछ नहीं तो उन्हें जानकारी दिए बगैर ही — तत्कालीन प्रशासनिक प्रमुख कर गए चमत्कार बड़ा— खेल गए खेल। चर्चा है कि खेल महकमा रहा नहीं कभी उनके पास—- मगर बेहद महत्वपूर्ण फैसले से जुडी फाइल को— ऊपर भेजे बिना ही निकाल गए साहब आर्डर मनमाना। मामला जुड़ा है जंगलात महकमे से— जिसे यूँ तो दी नहीं जाती वो तवज्जो— है जितने का हक़दार वो। है अच्छे से याद हमें वो लम्हे—- वो बातें— उनके ज़ज़्बात— कोशिश कि बहुत उन्होंने भी —- पर सुनने को था नहीं तैयार कोई भी— न समझने को हुआ कोई राज़ी। जो रहे सरकार के नज़दीकी— बोल न सके बात वो मई बेबाकी। चर्चा है कि सुन या समझ ली होती बात अगर— तो चलती न हज़ारों पेड़ों पर आरी— दिखते, खड़े होते आज भो वो— तने हुए, पर चांदी के चंद टुकड़ों पर— अपना ज़मीर बेच खाने वाले—- जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करने वालों ने— वो किया, जिसका पहले से था अंदेशा— इल्म था इस बात का— चंद कुर्सी नशीनों के दिमाग में घुमड़ रहे फितूर का—- और उन्हीं लोगों ने करवा दिया— अब काण्ड बड़ा। जंगलात महकमे के आला अफसरों ने —- तब भी जाते था विरोध— कि थी आवाज़ बुलंद— किये थे ज़ाहिर अपने दिली जज़्बात— पर चर्चा यही रही थी तब भी कि सरकार के लम्बे चौड़े तंत्र और— सुनने – सूंघने के लिए तत्पर रहने वाले— सादे और बावर्दी रहने वाले मुलाजिमों के सैंकड़ों आँख और कान— रहे बिलकुल नाकाम। बात नक्कारखाने में तूती— हुई साबित।

देखिये ज़रा, आखिर था क्या— 22 सितम्बर 25 की उस चर्चा में—-

बिना गार्ड कैसी प्रोटेक्शन !
तस्वीर दिखाते हैं आपको..वन एवं वन्य प्राणी महकमे की..जिस पर जिम्मा है वन एवं वन्य प्राणियों की रक्षा का..मग़्ार खुद लाचार..लगाता रहा है खाली पद भरने की गुहार..पिछले कई वर्षो से बार-बार..चर्चा ये कि वर्ष 2014 के बाद से..विभाग में नहीं हुई एक भी भर्ती.. बताइए कैसे करें काम..कैसे बचाएं वन-संपदा..और वन्य प्राणियों को। क्षेत्र हैं कई ऐसे जहां..घूमते-टोह लेते रहते हैं वन-तस्कर। कैसे रोकें उन्हें..जंगलात को रखें कैसे महफूज़ ..एचएसएससी को लिख करते रहे हैं अनुरोध..दे दीजिए-बख्श दीजिए फॉरेस्ट को गार्ड्स की कुछ पोस्ट। विभाग में हैं 1460 गार्ड की सेंक्शंड पोस्ट..तैनात सिर्फ 440..1020 की है कमी। कई प्रमोट हो गए..बहुत हो गए रिटायर..गुज़रे 11 बरसों में..नहीं हुई एक भी गार्ड की नफरी अंदर..न ही पसीजे अफसर..रहे जो भी जिम्मेवार। चर्चा ये भी है कि ..बिना मुख्यमंत्री की मंजूरी और..सीएमओ के आला अफसर की जानकारी में लाए बगैर ..वन विभाग के प्रशासनिक प्रमुख कर गए बड़ा चमत्कार..फाइल ऊपर भेजे बिना ही.. खुद निकाल गए आर्डर..रखा सरकार-सीनियर्स को अंधेरे में..पता नहीं किसे करना चाह रहे रोशन..फॉरेस्ट के प्रोटेक्टेड एरिया का जिम्मा..वन विभाग से लेकर..अब संभालेगा वाइल्ड लाइफ विंग..फिर हो प्लांटेशन या प्रोटेक्शन..चर्चा है कि ..बिना लिए किसी की ओपिनियन..सुना दिया विभाग को डिसीज़न। वो भी तब, जबकि..वाइल्ड लाइफ विंग के पास..स्टाफ ही नहीं पूरा..बमुश्किल दो से ढाई दर्जन मुलाजिमों के बूते ..हजारों एकड़ वाइल्ड लाइफ संभालने का है जिम्मा। अफसरों में है चर्चा ..पता चलेगा जैसे ही सीएम या सीएमओ के अफसरों को..कि बिना मंजूरी लिए निकाले गए आर्डर..तुरंत बदला जाएगा फैसला मनमाना। 

अब जानिए ताज़ातरीन, हुआ क्या—-

प्रोटेक्टेड फारेस्ट एरिया में करोड़ों रुपए कीमत की—- खैर की लकड़ी की तस्करी मामले में हुआ—दो सबसे बड़ों पर एक्शन। वन बल प्रमुख और 1989 बैच के वरिष्ठम आईएफएस—- विनीत कुमार गर्ग पर गिर गया नज़ला— उन्हें कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। वहीँ चर्चा में बने रहे— 1991 बैच के आईएफएस और चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन—- डॉ विवेक सक्सेना को भी हटा दिया गया। चर्चा है कि — सरकार के कानों तक पहुंचा दी गई— अंदर की बात और छिपे हुए राज़ —- तब जाकर हुआ एक्शन। पर्यावरण, वन एवं वन्य प्राणी विभाग के वर्तमान प्रशासनिक प्रमुख—- एसीएस सुधीर राजपाल ने निकाल डाले आर्डर— 1991 बैच के आईएफएस एवं पीसीसीऍफ़ रैंक के हरियाणा फारेस्ट डेवलपमेंट कारपोरेशन के एमडी— कैलाश चंद मीणा को हॉफ यानी— हेड ऑफ़ फारेस्ट फाॅर्स का एडिशनल चार्ज है दिया गया— वहीँ 1993 बैच के आईएफएस एवं पीसीसीऍफ़ रैंक के सीईओ कैम्पा— नवदीप सिंह हुड्डा को चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन का— अतिरिक्त कार्यभार है सौंपा गया। चर्चा है कि — गुजरे कई महीनों से वन भवन में कुर्सी की छिड़ी— अघोषित जंग में ये तो होना ही था— मगर वन तस्करों द्वारा फैलाये गए इस पूरे रायते को समेटते समेटते— आला अफसर भी सिमट जायेंगे— ये किसी ने सोचा न था। ब्यूरोक्रेसी में है चर्चा कि— हो जाना चाहिए था झगडे कि जड़ का पहले ही निपटारा— मगर क्या कहें, अब उम्मीद है कि— गलती का सुधार हो शायद। टेर्रीटोरियल फारेस्ट से बिना सीएम कि अनुमति के अलग किए गए वाइल्ड लाइफ विंग को— वापस मूल महकमे में रखने के आदेश हो जाएं। चर्चा है कि सिर्फ ऐसा करके ही—- बेहद कम तादाद वाली वाइल्ड लाइफ विंग को पुराने स्वरुप में— है लाया जा सकता।

 

ढूंढिए आस पास अपने— ढोंगी बाबा
जो महाराष्ट्र में हुआ, वो क्यों नहीं हो सकता यहां— या और किसी राज्य में। आला अफसरों से लेकर…राजनीति के धुरंधरों तक…हर किसी की गुड बुक में था वो…पता ही नहीं लगा किसी को…या जानते बूझते चुप रहे सब, जिम्मेदार …ओहदेदार…सूबे की रखवाली के जनता से चयनित… चौकीदार। कैसे खड़ा किया खरात ने…स्याह काली करतूतों का साम्राज्य…क्या था वो, और क्या हो गया। चर्चा में हैं वो…जो करते हैं पवित्र परिधान का… रोज़ाना अपमान। अपने अरीब करीब देखिए…थोड़ा सा सोचिए तो…दिख जायेंगे आपको ऐसे ही खैराती लाल….जिनका काम आपकी पोजीशन को लाभ उठाना…मेहनत या किस्मत से जुटाया धन खा जाना… पूजा अनुष्ठान के नाम पर मोटी रकम ऐंठना… बड़ों से सेटिंग करवाने का झांसा देना—आपको डराना…ये न किया तो वो हो जाएगा…ऐसा न किया तो वैसा हो जाएगा। ये भी सोचिए…दिन भर की जी तोड़ मेहनत… और पेट काट काटकर कमाई दौलत…उतनी नहीं दिखती…जितनी ये महा झूठेश्वर बना लेते हैं….टोपियां घुमाकर। और कुछ नहीं तो मकान या ज़मीन ही…नाम कर लेते हैं अपने…रखते हैं कई ठिकाने। चर्चा है कि— किसी को बताते यहाँ इबादत स्थल तो…किसी जगह को आश्रम। होता जहां जन कल्याण कार्य तो कम…मोटे क्लाइंट्स का भला, लगा के राजनीतिक प्रशासनिक दम खम। पहचानिए तो ज़रा…कल क्या थे ये महा…झूठेश्वर। आज खुद को क्या दिखाने… बताने लगे। बाइक खरीदने की औकात नहीं थी…गाड़ियां रंग बिरंगी…ऊंची रखने दिखलाने लगे। हुआ कैसे ये सब…कहां से आया। मेहनत तो और लोग भी हैं करते…पर घर उनके धन दौलत से तो नहीं भरते…कुछ आए समझ में तो…बताइएगा हमें भी…कमाते हम आप हैं…खाते वो हैं। अपने करीबियों को इक बार आप…कहीं घुमाने फिराने नहीं ले जा पाते….और एक ये हैं…पांव एक शहर सूबे में इनके चंद रोज़ न टिकते। महाराष्ट्र के ढोंगी बाबा अशोक खरात…की करतूतें और पूरी जानकारी… देख रही है आज दुनिया सारी। चलाता रहा वो अंधा विश्वास रखने वालों पर कटारी …अपने आस पास के ऐसे ही ढोंगियों को पहचानिए— तलाश न सकें तो, रहिये थोड़ा सा होशियार। ऐसे ही कुछ ढोंगियों की नई…अनसुनी कहानियां। मिलेंगी सुनने में आपको इक दिन ज़रूर— भरोसा रखिए भरपूर। चर्चा है कि सरकारों के मंत्रियों और अफसरों को अपनी भुजाओं पर नहीं….तकदीर छोड़िये …तकरीर पर नहीं ….बुद्धिमता पर भी नहीं, बल्कि…. मलाईदार डीलिंग का झांसा देने वालों पर रहता है भरोसा…. तभी ऐसे झांसा देने वालों को — घर बुला बुला के देते हैं न्योता— कि आ के मुझको फंसा।

 

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