न्यूज़म ब्यूरो
मुंबई,20 अक्टूबर। हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि दर्शकों की यादों, भावनाओं और जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं। शाहरुख खान और काजोल की ऐसी ही एक सदाबहार फिल्म है ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (डीडीएलजे)। 20 अक्टूबर 1995 को रिलीज हुई इस फिल्म ने 20 अक्टूबर 2025 को अपने 30 साल पूरे कर लिए। खास बात यह है कि तीन दशक बाद भी मुंबई के मशहूर मराठा मंदिर सिनेमाघर में फिल्म का रोजाना प्रदर्शन जारी है। बदलते दौर, नई तकनीक और ओटीटी के बढ़ते प्रभाव के बावजूद राज और सिमरन की प्रेम कहानी बड़े पर्दे पर दर्शकों को आकर्षित कर रही है।
राज और सिमरन की प्रेम कहानी ने बदली रोमांस की परिभाषा
निर्देशक आदित्य चोपड़ा की बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ ने हिंदी सिनेमा में रोमांस को एक नया अंदाज दिया। फिल्म में शाहरुख खान ने राज मल्होत्रा और काजोल ने सिमरन सिंह की भूमिका निभाई। विदेश में पले-बढ़े दो युवाओं की मुलाकात, दोस्ती, प्यार और परिवार की सहमति से रिश्ते को मुकाम तक पहुंचाने की कहानी ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई।
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि राज केवल सिमरन को पाने के लिए उसके परिवार के खिलाफ नहीं जाता, बल्कि उसके पिता का विश्वास जीतने की कोशिश करता है। अमरीश पुरी ने सिमरन के पिता चौधरी बलदेव सिंह के किरदार को यादगार बनाया। वहीं, अनुपम खेर, फरीदा जलाल, मंदिरा बेदी और परमीत सेठी सहित अन्य कलाकारों ने कहानी को मजबूती दी। फिल्म के गीत ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम’, ‘मेहंदी लगा के रखना’ और ‘रुक जा ओ दिल दीवाने’ आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं।
मराठा मंदिर में क्यों जारी है फिल्म का प्रदर्शन?
मुंबई के भायखला इलाके में स्थित मराठा मंदिर सिनेमाघर की पहचान अब ‘डीडीएलजे’ के साथ जुड़ चुकी है। 1958 में शुरू हुए इस सिनेमाघर में फिल्म के रिलीज होने के समय से ही इसका प्रदर्शन जारी है। यहां रोजाना सुबह 11:30 बजे फिल्म का शो आयोजित किया जाता है। इस तरह मराठा मंदिर भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अनोखी मिसाल बन गया है।
फिल्म के लगातार प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ी वजह दर्शकों का प्यार है। सिनेमाघर में पुराने प्रशंसक अपनी यादें ताजा करने आते हैं, तो नई पीढ़ी भी बड़े पर्दे पर इस प्रेम कहानी का अनुभव करना चाहती है। कई दर्शकों के लिए फिल्म देखना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक खास परंपरा बन चुका है। सप्ताहांत में भी फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की अच्छी संख्या जुटती है।
सिनेमाघर प्रबंधन का रुख भी स्पष्ट रहा है कि जब तक दर्शक फिल्म देखने आते रहेंगे, इसका प्रदर्शन जारी रखने की कोशिश की जाएगी। हालांकि, कोविड-19 महामारी के दौरान सिनेमाघरों के बंद होने से इसका नियमित प्रदर्शन कुछ समय के लिए रुका था। सिनेमाघर दोबारा खुलने के बाद फिल्म ने फिर पर्दे पर वापसी की।
तीन दशक बाद भी क्यों कायम है दीवानगी?
‘डीडीएलजे’ की लोकप्रियता का कारण केवल शाहरुख और काजोल की शानदार केमिस्ट्री नहीं है। फिल्म में प्यार, परिवार, परंपरा और व्यक्तिगत पसंद के बीच संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई गई है। राज का चुलबुलापन, सिमरन की भावनाएं और पिता की स्वीकृति के लिए संघर्ष आज भी दर्शकों को कहानी से जोड़ता है। खासकर अंतिम दृश्य, जिसमें सिमरन चलती ट्रेन के पीछे दौड़ती है और उसके पिता उसे राज के साथ जाने की अनुमति देते हैं, हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार दृश्यों में गिना जाता है।
फिल्म ने शाहरुख खान को रोमांटिक हीरो के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई और काजोल के करियर की भी सबसे यादगार फिल्मों में अपनी जगह बनाई। आदित्य चोपड़ा की कहानी, संवाद, संगीत और यूरोप से पंजाब तक के खूबसूरत दृश्य इसकी लोकप्रियता के प्रमुख आधार बने।
तीस साल बाद ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ का मराठा मंदिर में लगातार प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि अच्छी कहानियों की उम्र समय से तय नहीं होती। पर्दे पर राज और सिमरन का प्यार आज भी वही एहसास जगाता है। यही वजह है कि नई फिल्मों की भीड़ के बीच यह पुरानी प्रेम कहानी दर्शकों के दिलों में अपनी खास जगह बनाए हुए है।
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