Follow

चर्चा तो है….

निश्छल भटनागर की कलम से….

 

आस न्याय की 

सुना है बहुत मर्तबा बड़े बुजुर्गों ….कानून के जानकारों से। इन्साफ पसंद तमाम हुक्मरानों के मुंह से। उनके मिजाज़ से। उनकी पसंद और नापसंदगी से। वो यह कि, चाहे सौ गुनाहगार छूट जाएं, मग़र…. एक बेक़सूर को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। न्याय के इस अडिग, अटल, बुनियादी और नैसर्गिक सिद्धांत पर चलने वाले…. इसी बात का हैं दम भरते। कह- गुजरने से नहीं हैं डरते। ऐसे में न्याय की पारखी आंखें…. किसी के भी ज्ञान-चक्षु खोल सकती हैं। सही गलत और अच्छे बुरे का भान करा सकती हैं। निर्दोष के जीवन की रक्षा करना…. उतना ही सही है, जितना ये कि ….किसी बेक़सूर को सज़ा देना होता है…. सबसे बड़ा अन्याय। वहीँ, ये भी है तर्कसंगत कि…. गुनाहगार बचने न पाए लेकिन…. बेक़सूर को भी सज़ा न मिले। हरियाणा का तो ताज़ा उदहारण है, लेकिन…. ये मामला देश के सभी राज्यों के लिए बन सकता है नज़ीर। चर्चा है कि…. हरियाणा में स्टेट विजिलेंस कमीशन का हो गठन….तो खत्म हो मन की उलझन। न रहे कोई भी संशय…. और किसी भी अफसर या कर्मचारी के….चेहरे पर शिकन। क्या इतना है मुश्किल यह….टटोला कुछ IAS अफसरों का मन…तो मुद्दे पर दिखा उनका अपनापन। आईं किस्म किस्म की दलीलें। बने ऐसा कमीशन तो विजिलेंस पर भी चेक एंड बैलेंस रखा जा सकता है। कमीशन में रखा जाए एक रिटायर्ड IAS….एक रिटायर्ड IPS…. और हो एक रिटायर्ड जज।

Advertisement

चर्चा है कि….ऐसा करके भेदे जा सकते हैं दो लक्ष्य। पहला ये…. राज्य के किसी भी क्लास वन या क्लास टू अफसर….के खिलाफ किसी भी जांच रिपोर्ट पर… एकदम से कार्रवाई करने की बाध्यता पर लगेगा विराम…. मिलेगा उन्हें भी अपना पक्ष रखने का…. मौका। बता सकेंगे वो भी कि हुआ क्या था। कैसे हुआ था और किन परिस्थितियों में…. और क्यों गई जांच रिपोर्ट उनके खिलाफ। सरकार के माथे से हटेगा…आनन फानन में कार्रवाई कर देने का आरोप। वो भी बिना उचित मंच पर सुनवाई हुए बिना। कमीशन में होंगे रिटायर्ड सीनियर IAS, IPS और रिटायर्ड जज साहिबान….तो वो अपनी अनुभवी नजरों से परख सकेंगे…. कर सकेंगे बारीकी से पहचान। अभी तलक, सरकार तक एंटी करप्शन ब्यूरो की ओर से…. सौंपी गई जांच रिपोर्ट पर फैसला लेने से पहले….आएगा एक आवश्यक चेक- बैरियर….जो देगा अपनी एक्सपर्ट ओपिनियन। अभी हो क्या रहा है या…हुआ क्या है, कि…. हालिया चर्चित भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में….सीबीआई ने मांगी हरियाणा सरकार से…. PCA के अंतर्गत धारा 17 A की परमिशन…. और सरकार अपने ऐलान से उपजी बाध्यता में बंध कर…. हो गई हामी देने को मजबूर। यही वो पॉइंट था, जहां…. अगर होता एक विजिलेंस कमीशन, तो…. देखा परखा समझा जा सकता था विजिलेंस जांच रिपोर्ट का मंतव्य। उसकी फाइंडिंग्स। आखिर आल इंडिया सर्विस के क्लास वन….और क्लास टू अफसर के भविष्य का सवाल जो ठहरा। रिपोर्ट में कोई पेंच भी तो है हो सकता। गलती तो किसी से भी संभव है। कोई भी परफेक्ट नहीं…. ऐसे में एक तो वो जिस पर है आरोप…. दूसरा पुलिस जांच करने वाला विंग, यानी विजिलेंस। यहाँ पर जरुरत पड़ती थर्ड पार्टी…. यानी अपनी अपनी फील्ड के तीन अनुभवी…. रिटायर्ड IAS  – IPS  और रिटायर्ड जज साहिबान…. की मौजूदगी वाले विजिलेंस कमीशन की। जिनकी नज़रों से दूध का दूध और…. पानी का पानी होने में देर न लगती। हाँ, फिर भी अगर दिखती संलिप्तता तो…. केंद्रीय एजेंसी तो जांच करने को…. मौक़ा लपकने को थी ही तैयार।

ऐसे में सरकार के स्तर पर हर अफसर से जुड़े मामले की….सच्चाई सुनी जा ही नहीं सकी…. मौका ही नहीं मिला उन्हें अपनी बात कहने…. खुद को बेकसूर  दिखलाने का। और फिर हुआ वो….जो अमूमन होता नहीं कभी…. बूझिये क्या….वो क्लीन चिट, निर्दोष होने, आरोप मुक्त होने…. बेकसूर प्रमाणित होने का सर्टिफिकेट मिलना। हलांकि अभी भी…. कुछ अफसरों पर लटकी हुई है…. कार्रवाई की तलवार। इस खास घटनाक्रम ने…. रिटायर्ड अफसरों और जज साहिबान के…. ऐसे विजिलेंस कमीशन की अनिवार्यता को…. परिस्थितिजन्य घटनाक्रम के हिसाब से ज़रूरी और सामयिक दर्शाने में….नहीं छोड़ी है कोई कोर कसर। ऐसे में सरकार सोचे विचार के….बड़ी तरतीब से… ऐसी कोई तरकीब अमल में ला सकती है…. और गठित कर सकती है। केंद्र सरकार में बने सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की तर्ज पर….हरियाणा स्टेट विजिलेंस कमीशन।

चर्चा यहीं नहीं ठहरती….. अब बताते हैं, दूसरा और ज्यादा अहम लक्ष्य। अभी तक हरियाणा में स्टेट विजिलेंस ब्यूरो ही है कार्यरत, जिसकी कमान है…. वरिष्ठ  IPS अरशिंदर सिंह चावला के हाथ। विभाग का पूरा सेटअप है…. तमाम ईमानदार अफसर जुटे हैं, डटे हैं, रोज़ाना जूझते हैं….सिस्टम में मौजूद काली भेड़ों को, फिर हों वो चाहे….किसी भी महकमे से जुड़े। उन गन्दी मछलियों को जो…. पूरा तालाब या यूं कहें कि…. विभाग रुपी नदी-नहर ही करती दिखती हैं गंदा। वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट्स में है ये अहम चर्चा कि…. अगर हो ऐसा इक कमीशन तो…. वहां हो सकती है पर्याप्त सुनवाई। ऐसे में किसी जांच अफसर की निजी पसंद या…. किसी ऊपरी दबाव से हुए असर को भी…. किया जा सकेगा बेअसर। कमीशन के रिटायर्ड अफसर और जज साहिबान देखेंगे कि…. किस जांच अफसर ने किया क्या, कौन से तथ्यों को बनाया आधार। कहाँ कहाँ से निकाली ….मामले से जुडी जन्म कुंडली। कोई दुराभाव…. या पूर्व टशन तो नहीं है निकाली। अक्सर ऐसा देखने में है आता कि…. कोई अफसर किसी जिले में रहा तो…. सख्त रहा। सही रहा या गलत रहा। किसी अधीनस्थ कर्मी को पसंद करता या…. करता नापसंद, चेहरा देखना करता नापसंद। सर्विस में कई बार आता है, ऐसा मोड़…. कि परिस्थितियां सही गलत का बोध कराते हुए भी…. किसी को मामले में टांग देने जैसा माहौल हैं बना देतीं। और ये कहीं भी हो सकता है। ऐसे पसंद या नापसंद रखने वाले किसी भी…. सिस्टम में हो सकते हैं। वरिष्ठ रिटायर्ड IAS-IPS अफसर खुद इसे ठहराते हैं सही कि…. पुलिस विभाग इससे अछूता नहीं कहा जा सकता। पर्सनल लाइक या डिसलाइक तो होती ही है। आला अफसर तो यहाँ तक हैं कहते कि…. कोई भी किसी भी लेवल पर हो सकता है…. किसी से प्रभावित। या पसंद नापसंद रख सकता है। और अगर विजिलेंस में ही किसी अफसर ने कर दी गड़बड़ तो…. क्या होगा। कौन देखेगा। किससे शिकायत की जाएगी। कौन कर सकता है शिकायत। कहीं कोई सुनवाई है भी या…..। ऐसे में एक अलग सिस्टम, अलग सा कमीशन…. आरोपी ठहराए जा रहे अफसरों या कर्मियों की सत्य निष्ठा पर…. उठने वाले प्रश्न चिन्ह…. पर दे सकता है सरकार को सही ओपिनियन। उसके बाद सरकार ले फैसला कि…. मामला जाना चाहिए आगे या कमीशन के सुझावों पर ही…. लेना है एक्शन।

 

 

थप्पड़ की गूंज 

कोई किसी को थप्पड़ मार दे…. सरे राह, सरे बाजार, सरे आम, सबके बीच। और फिर उम्मीद करे कि सामने वाला कुछ बोले भी ना। ऊपर से आला अफसर कार्यवाही भी न करे। ऐसा होता या चलता है कहीं…. आप ही बताओ। मग़र यही हकीकत है कि…. हुआ है ऐसा ही कुछ। नायब सरकार के एक महकमे में एक महिला कर्मचारी ने अपने सीनियर को…. जड़ दिया तमाचा। लगा दिया थप्पड़। अब वजह जो भी हो…. मग़र क्या ऐसा करना न्यायसंगत कहा जा सकता है। सही  ठहराया जा सकता है। फिर महिला की शिकायत ये कि…. उसके खिलाफ अनुशासनात्मक या विभागीय कार्यवाही क्यों हुई। कमाल है। चर्चा है कि…. कुछ ऐसे सूरते हाल में एक मामला वरिष्ठों के पास पहुंचा। पूरे इत्मीनान के साथ बताया गया कि क्या हुआ। किसने किया। कब किया। कैसे किया। ज़ाहिर है, अनुशासनात्मक कार्यवाही तो बनती ही है। सो हुई भी। मग़र भला हो उन मातृ शक्ति का…. जिन्होंने उलटा ही मामला मुकदमा दर्ज करवा दिया। उसके खिलाफ इसे ज्यादा था थप्पड़। मामला पहुंचा दिया पुलिस थाने। बस  गनीमत यही रही कि थप्पड़ खाने वाले और ….थप्पड़ बरसाने वाली महिला कर्मी….एक ही समाज से हैं आते। ऐसे में पुलिस की वो धारा तो पीड़ित पर नहीं लगी, मग़र…. कोई कसर भी बाकी नहीं बची। अब चर्चा ये है कि…. महकमे के जिस सुपीरियर अफसर का बनता था क्षेत्राधिकार। उसने तो लेना ही था संज्ञान, सो लिया भी। क्या करता, चुप थोड़े ही रहता। सिस्टम ने कलम दी ही है…. चलाने के लिए, सो चला दी। मग़र हो गया यहां भी उल्टा पुल्टा। समाज विशेष के दबाव में…. हो गया काण्ड। अपने सीनियर को थप्पड़ मारने का दंड मिलना…. या इस कृत्य पर महिला कर्मी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही तो क्या होती। सुपीरियर अफसर के खिलाफ ही पहुंचा दी शिकायत। वो भी ऐसी जगह, जहां होती है…. हर किसी की सुनवाई। चर्चा यही है कि…. महिला के मिथ्या आरोप समाज ने बता दिए सही। और कार्रवाई के लपेटे में आ गए पीड़ित अधिकारी समेत…. सुपीरियर ऑफिसर।

चर्चा ये कि….अब कौन समझाए सही या गलत। सुपीरियर अफसर की कलम ही ठहरा दी गई सबसे बड़ी गुनहगार…. फिर तो क्या ही बचना था उनका संसार। चाबुक उसी अफसर पर चला दिया गया। अच्छे खासे दफ्तर आते आला अफसर को…. जैसे घर पर ही बिठा दिया गया। अब विभाग में है यही चर्चा कि…. सिस्टम की कलम हो चुकी है ससपेंड। अब कौन करे, कहां करे फ़रियाद। किसको सुनाए दुखड़ा अपना, कैसे हो सस्पेंशन से आज़ाद। विभागीय प्रमुख की भूमिका पर भी….उठ रहे हैं सवाल। सुपीरियर अफसर के खिलाफ…. अपनी कलम दौड़ने….इतनी बड़ी कार्रवाई से पहले…. क्यों नहीं की मुकम्मल सुनवाई। क्यों नहीं पूरी बात ऊपर तक बताई। प्रशासनिक सचिव और मंत्री सहित सरकार की…. नाहक ही करवाई जग-हंसाई। अपने ऊपर आने वाली बात…. क्यों दूसरे की तरफ फिरवाई। आखिर क्यों चुप्पी साध ली गई। खैर, अब जो भी हो…. इतना तो हो गया साफ कि…. सिस्टम में सुधार की है बहुत ही गुंजाईश। इस ओर देखा संभाला न गया तो…. होती रही ऐसी ही धींगा कुश्ती….और सिस्टम से ज़ोर आजमाइश।

 

 

जुआड़ियों से उगाही 

चंडीगढ़ के नज़दीक एक जिले में…. चल रहा है ऑनलाइन गैंबलिंग का धंधा। खुलकर बोलें तो जुआं। बड़ी बात ये नहीं…. असल दिक्कत ये है कि पूरे कारनामे की भनक मिलने पर…. पुलिस और कानूनी कार्रवाई करवाने की बजाय…. दे दिया साइलेंट रहने का सपोर्ट। तय कर दी अपनी कीमत, धंधेबाज़ों के सामने। उनके आगे झुककर बन गया गोरख धंधे का हिस्सा। बड़ी बात ये भी नहीं…. चर्चा है कि, ”बड़ी सरकार” का ही एक करीबी बना बैठा है…. धंधे का सूत्रधार। धंधा बंद करवाने की बात कहकर…. उगाही से जोड़ लिया उसने नाता। अब उसे चिंता नहीं किसी की। पुलिस के दो सिपाही…. वो साथ लेकर है घूमता। कहीं भी जाता रौब झाड़ता। मनमानी करवाता। जबरन लोगों से पैर छुआता। अपने गले में माला पड़वाता। क्या क्या बताएं…. ज्यादा कुछ कहा नहीं जाता। सुनने में यहाँ तक है आया कि…. दूसरे जिलों में भी ऑनलाइन गैंबलिंग के…. तार वो ढूंढ रहा। तलाश रहा कोई माकूल जगह, जहाँ मिले आज़ादी कानून की जद में आने से।

सूत्र तो यहाँ तक बताते कि…. इतना माल है बटोरता कि…. ज्यादा जेबों वाली कमीज ही है पहने रहता। हालांकि इलाकाई पुलिस के कुछ जिम्मेवारों को है बाखूबी ज्ञान…. मग़र बने बैठे हैं बिलकुल अनजान। समाज के दुश्मनों के करीबी दोस्त…. और समज के दोस्तों की दुश्मन। एकदम मासूम सी। ये और है कि ऊपर है तेजतर्रार अफसर के हाथ जिले की कमान। ऐसा माना है जा सकता कि …. जब भी आएगा उन्हें अपने फ़र्ज़ और…. पुलिस वर्दी पहनते समय ली गई शपथ का ध्यान…. ज़रूर पहुंचाएंगे ऐसे गोरखधंधे से जुड़े…. जरायम की दुनिया के धंधेबाजों को सींखचों के पीछे वाला स्थान। और बड़ी सरकार तक पहुंचाएंगे…. उनके करीबी की कारस्तान, जहां …. खींचे जा सकेंगे उसके कान।

 

पढ़ने के लिए धन्यवाद

आपका समय और भरोसा हमारे लिए बहुत मायने रखता है। अगर यह खबर आपके लिए उपयोगी रही, तो हमसे जुड़े रहें — हर ज़रूरी खबर के लिए Newsam को फ़ॉलो करें।

Advertisement
Tap to Refresh