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भगवान् श्रीकृष्ण की बांसुरी केवल एक वाद्य नहीं, अपितु पूर्ण शून्यता और समर्पण का प्रतीक है : स्वामी जी

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स्वामी श्रीनिवासाचार्य 

पंचकूला : श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) माता मनसा देवी परिसर में चल रही श्रीमद्भागवतमहापुराण का षष्ठ दिवस बड़े ही दिव्य भव्य उल्लास से सम्पन्न हुआ। कथा में पूज्य व्यास स्वामी श्रीनिवासाचार्य जी महाराज ने गो शब्द की व्याख्या की, जिसमें उसे गाय, पृथिवी तथा इन्द्रिय कहा गया है । इन्द्रियों को वश में करने से भगवत्प्राप्ति सहज है। जो भगवान् से विमुख है, उसका जीवन ही व्यर्थ है। भगवान् श्रीकृष्ण की बांसुरी के प्रसंग में पूज्य गुरुदेव ने बताया कि भगवान् श्रीकृष्ण की बांसुरी केवल एक वाद्य नहीं, अपितु पूर्ण शून्यता और समर्पण का प्रतीक है। बांसुरी भीतर से खोखली होती है उसका यही शून्य भाव उसे मधुर नाद का अधिकारी बनाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह संदेश मिलता है कि जब जीव अपने भीतर के अहंकार, कामना और स्वार्थ को निकाल देता है, तभी वह ईश्वर की कृपा का माध्यम बनता है। बांसुरी स्वयं कुछ नहीं बोलती, जो बोलता है वह कृष्ण का श्वास है अर्थात् जब जीव अपने को कर्ता न माने, तब परमात्मा उसके माध्यम से कार्य करता है। बांसुरी का नाद ब्रज की गोपियों, पशु-पक्षियों, वृक्षों और नदियों तक को आकृष्ट करता है । संसार की समस्त आत्माएँ उसी नाद की खोज में भटक रही हैं। जो जीव उस नाद को सुन लेता है, उसके लिए संसार के आकर्षण फीके पड़ जाते हैं।

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रासलीला के प्रसंग में पूज्य स्वामी जी ने बताया कि रासलीला को सामान्य दृष्टि से देखना भूल है। रास कोई लौकिक नृत्य नहीं, बल्कि जीव और ब्रह्म के बीच प्रेम की चरम अभिव्यक्ति है। गोपियाँ कोई साधारण स्त्रियाँ नहीं, वे शुद्ध जीवात्माएँ हैं और कृष्ण परमात्मा। रास में प्रत्येक गोपी के साथ कृष्ण का होना यह दर्शाता है कि भगवान् प्रत्येक भक्त के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहते हैं । रास मण्डल वृत्ताकार है जिसका कोई कोना नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। यहाँ केन्द्र में केवल कृष्ण हैं। जब तक जीव अपने जीवन के केन्द्र में भगवान् को नहीं रखता, तब तक रास संभव नहीं। जैसे ही अहंकार हटता है, जीवन स्वयं एक रास बन जाता है। कंस वध के प्रसंग में बताया गया कि कंस केवल मथुरा का राजा नहीं था, वह अहंकार, भय और अधर्म का मूर्तरूप था। उसे यह भय था कि देवकी की संतान उसका अंत करेगी। आध्यात्मिक दृष्टि से यह भय अहंकार का स्वभाव है, अहंकार सदैव सत्य और प्रकाश से डरता है।

कंस ने देवकी के छह पुत्रों का वध किया यह दर्शाता है कि अहंकार मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले शुभ संकल्पों और सद्गुणों को प्रारम्भ में ही नष्ट कर देता है। किन्तु योगमाया द्वारा सुरक्षित बलराम और स्वयं कृष्ण यह संकेत देते हैं कि ईश्वरसम्बन्धी तत्व को अहंकार कभी नष्ट नहीं कर सकता। भगवान् ने कंस का वध किया, किन्तु उसके प्रति द्वेष नहीं रखा। यह दर्शाता है कि ईश्वर दण्ड देते हैं, पर वैर नहीं रखते। भक्त के जीवन में भी यह भाव आना चाहिए कि अधर्म का विरोध हो, पर मन में घृणा न हो। रुक्मिणी विवाह के प्रसंग में पूज्य स्वामी जी ने कहा कि रुक्मिणी कोई साधारण राजकुमारी नहीं, वह शुद्ध जीवात्मा का प्रतीक है। उसने कृष्ण के गुणों को सुनकर मन ही मन उन्हें पति रूप में स्वीकार कर लिया। यह दर्शाता है कि श्रवण-भक्ति से प्रेम उत्पन्न होता है। कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का हरण यह सिखाता है कि जब जीव पूर्णतः शरणागत हो जाता है तब भगवान् स्वयम् उसे संसार से निकाल लेते हैं। यह कर्म जीव की योग्यता नहीं, बल्कि ईश्वर की करुणा है। कंस का वध और रुक्मिणी का विवाह से हमें ज्ञान करवाता है कि जब भीतर का अहंकार मरे, तभी आत्मा का परमात्मा से मिलन संभव है।

 

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