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मन को चुराना ही मक्खन को चुराना है : स्वामीजी

स्वामी श्रीनिवासाचार्य 

पंचकूला : श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम (संस्कृत गुरुकुल) माता मनसा देवी परिसर में चल रही श्रीमद्भागवतमहापुराण का पंचम दिवस बडे ही दिव्यता से सम्पन्न हुआ। पंचम दिवस की कथा में भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं के माध्यम से अहंकार-नाश, भक्ति की श्रेष्ठता और शरणागति का दिव्य संदेश पूज्य स्वामीजी ने दिया।

 

स्वामीजी ने बताया कि ब्रजवासियों की सरल, निष्कपट और अनन्य भक्ति का वर्णन कर ब्रज के लोग यज्ञ, कर्मकाण्ड या इन्द्रादि देवताओं की अपेक्षा सर्वस्व भाव से केवल श्रीकृष्ण पर निर्भर रहते हैं। इस भाव को स्पष्ट करते हुए हमें भी अनन्य भाव से भगवान् की आराधना करनी चाहिए ऐसा भाव बताया। भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि – जो मुझे ही सर्वस्व मानकर मेरी शरण में आता है, वही सच्चा भक्त है।

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ईश्वर को पाने के लिए दिखावा, भय या लोभ नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण आवश्यक है।  ब्रज में परम्परानुसार इन्द्र-यज्ञ होता था। भगवान् श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों से प्रश्न किया “वर्षा तो कर्म के अनुसार होती है, फिर इन्द्र की पूजा क्यों?” फिर भगवान् श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत, गाय, ब्राह्मण और प्रकृति की पूजा का उपदेश दिया।

 

यह कर्म से ऊपर उठकर कर्तव्य-बोध और प्रकृति-संरक्षण का दिव्य संदेश देता है। जब ब्रजवासियों ने इन्द्र-यज्ञ त्याग कर गोवर्धन पूजन किया, तब इन्द्र के अहंकार को ठेस पहुँची और उन्होंने अतिवृष्टि कर ब्रज को डुबोने का प्रयास किया। ऐसे ही मनुष्य भी ठेस के बाद इतस्ततः विचरण करने की सोचता है। छोटी अंगुली में गोवर्धन को उठाकर भगवान् सत्वगुण की प्रधानता का बोध कराते हैं।

 

मक्खन को भगवान् चुराते है इस प्रसंग में पूज्य गुरुदेव ने बताया कि मन को चुराना ही मक्खन को चुराना है। भगवान् की लीला का वर्णन बहुत ही दिव्यता से वर्णन करते हुए गोवर्धन भगवान् के प्रसंग में सोऽहम् की भावना को भी प्रकट किया। अन्त में सभी सज्जनों भक्तों द्वारा प्रसाद तथा भण्डारा भी ग्रहण किया गया।

जय जय श्रीमन्नारायण 

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